ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १२
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १२

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १२

उन्हें गये, काफ़ी दिन गुज़र चुके थे,
हालत में बेचैनी थी उनके इंतेज़ार में,
इंकार कि इक़रार नहीं सोच रही मैं,
बस एक ख़ुमारी चढ़ी हुई थी मुझपे,
परेशानी का दौर मुंतज़िर था उसपे,
किसी से पता नहीं चल रहा था मुझे,
ख़बर ना इतेल्ला आ रही थी कहीं से,
इश्क़ और याद में शायद फ़र्क़ यही है,
याद धुंधला जाती है इश्क़ महकता है,
इश्क़ की लक़ीर गहरी है मेरे हाथों में,
और गहराती जाती है उनकी यादों में,
वो आ जाएं वापस जल्द, ख़ुदा ख़ैर करे,
देखती हूँ अक़्स अक़्सर हथेलियों में मैं,
फिर चूम लेती हूँ हथेलियां झूम के मैं,

इश्क़ में दूरियां ख़ूब क़माल करती हैं,
दिल की धड़कनों को यूं बढ़ाये देती हैं,
के लगे कि वो हैं सामने और नहीं भी हैं,
के रुख़ पे ख़ामोशी भी है लाली भी है,
मुस्कान अंदर की बेचैनी बयां करती है,
उनके बग़ैर अब इंतेहाई तन्हाई रहती है,
होने ना होने के बीच वक़्त ख़ामोश है,
हो रही उनके लिए ज़िंदगी मदहोश है,
आ भी जाओ तो कारवां ए दिल चले,
तुम चलो तो साथ हमारे ज़िंदगी चले,
सोचती हूं फिर ठहर कर हूं सोचती मैं,
किस क़दर बेचैनियों में ठहरती हूं मैं,
सपनों पे चाँद टांकूँगी तुम जो मिल गये,
सपने ख़ाक करूँगी जो तुम हुए किसी के,

क्यों ये बदहवासी छाने लगी है मुझपे,
क्यों होश ओ हवासी गवाने लगी हूँ मैं,
जाओ नहीं सोचती अब तुम्हारे बारे में,
जो आओगे याद तो याद भुला दूंगी मैं,
अकेले में ही सही मगर मुस्कुरा दूंगी मैं,
ये सोच सोच कर क्यों घबरा जाती हूं मैं,
होगी मुलाक़ात तो क्या कह पाऊंगी मैं?
अभी तो ये भी नहीं मालूम कहां के हैं वे,
पूछ ही लेती अगर गुफ़्तगू का वक़्त मिले,
हाय ये कम्बख़्त वक़्त ही नहीं मिलता मुझे,
जो थोड़ा बहुत हासिल है, क्यों गवाऊं उसे,
मिलन की आस जी भरे तो ग़ौर कर पाऊं मैं,
ख़ैर जाने दो, मना ही लिया है मन को मैंने,
क्या क्या जतन किये हैं ना जाने कैसे कैसे,

उड़ती उड़ती ख़बर मिली के वापस आ गये,
ज़रा चोट भी लगी के बतलाया भी नहीं मुझे,
आदत जो हो चली है चोट ख़ाने की मुझे,
और क्या लगती हूं मैं जो वो बतलायें मुझे,
ख़ुशी थोड़ी कम कभी ज़्यादा हो रही थी,
और मैं अकेले बैठे बैठे बस यही सोच रही थी,
वो क्यों कुछ कहें हमसे क्या है दरमियां हमारे,
जो सोच रही हूं, ये तो बस मेरी ही क़ैफ़ियत है,
ख़बर सच हो होगी, आख़िर गये थे रिश्ता करने,
क्या ही जानूं मैं और क्यों ही जानूं कुछ भी मैं,
लगती ही क्या उनकी, जो जा कर तलाशूं मैं,
बताया नहीं आ गये, क्यों परेशां हूं सोच के मैं,
जानते बूझते सबकुछ क्यों झुंझला रही उनपे,
कुछ है तो है नहीं दरमियां अभी तक हमारे,
फिर क्यों बुन रहीं हूं ख़याली पुलाव ढेर सारे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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