ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १३
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १३

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १३

बात हद से गुज़र जाये, तो बात नहीं रहती,
रात, भरे पूरे दिन में कभी रात नहीं रहती,
बादल आ के ढांप ले उजला उजाला अगर,
और बरस कर चल देते हैं वो भी यूंही मगर,
रह जाती है सौंधी सौंधी सी मिट्टी की सुगंध,
उस महक से सराबोर हो जाता है तनबदन,
उस महक़ को क्या कहते हैं? शायद लगन,
जिसको छू सकता है बस उजला हुआ मन,
उसी लगन के सहारे आज बतियाऊंगी मैं,
जानती हूं मान जायेंगे वो जब मनाऊँगी मैं,
बुनती हूं ख़्वाब, ख्वाबों की ताबीर चाहती हूं,
जो चाहूं मैं शिद्दत से आख़िर पा ही जाती हूं,

उधड़े हुए मन से विश्विद्यालय जा रही थी मैं,
सोचा था जा कर के सीधे ही मिल लूंगी उनसे,
ज़ोर ज़ोर से क़दम बढ़ रहे थे उस तरफ़ मेरे,
पास उनके कमरे के पहुंच कर थम गई थी मैं,
सोचने लगी कि पूछूंगी तो क्या पूछूंगी उनसे,
और पूछते वक़्त जो पूछ लिया उन्होंने हमसे,
क्योंकर जानना चाहती हो तुम ये सब मुझसे,
क्या कहूंगी आख़िर इसके जवाब में मैं उनसे,
इक दफ़े सोचा कि क्या होगा जो पूछा हमसे,
कहूंगी, क्या मैं ये भी पूछ नहीं सकती आपसे,
मन ही मन मुसमुसा रही थी, घबरा रही थी मैं,
देखा हड़बड़ी में जल्दी से भागते वो आ रहे थे,
और बिना देखे ही कमरे में चले गये वो अपने,

इक तो ऐसे ही झुंझलाहट हो रही थी उनपे,
ऊपर से बिना देखे ही वो चले गये कमरे में,
अर्दली आया, अभी खड़ी ही हुई थी वहीं पे,
बोला साहब बुला रहे हैं कृपया अंदर जाइये,
इकदम सन्नाटा सा छा गया चारों तरफ़ मेरे,
हवा के चलने की आवाज़ को सुन रही थी मैं,
उसने जो कहा, दो पल लगे मुझे समझने में,
फिर यक़ायक़ ही मुस्कुराहट छा गई रुख़ पे,
काफ़ूर हो गया ग़ुबार जो भर गया था मुझमें,
ख़ुशी की बहार से सराबोर होने लगी थी मैं,
तेज़ क़दमों से उनके कमरे की ओर चली मैं,
दरवाज़ा खटखटाने की सोची तक नहीं मैंने,
ख़ुशी से दमकता चेहरा ले सामने जा बैठी मैं,
कैसे हैं आप इस क़दर चहक कर पूछा मैंने,
और फिर बातों का सिलसिला छेड़ दिया मैंने,
ज़रा ही देर में बेतक़ल्लुफ़ सी हो गई उनसे,
कहां थे इतने दिन तक क्या किया आपने,
यूं धीमी सी आवाज़ सुनाई दी इतने में मुझे,
मैं ख़ामोश हुई तो देखा वो थे कुछ कह रहे,
इक़दम चुप्पी सी साध ली थी उस वक़्त मैंने,
कैसी पढ़ाई चल रही है वो पूछना चाह रहे थे,
मेरा मक़सद तो था कि ये जान लूं मैं उनसे,
रिश्ता तय हुआ कि नहीं ग़र हुआ तो किससे,

थोड़ी देर बात चलती रही किताबों की उनसे,
और मेरी धड़कने बढ़ती गईं वहीं पर बैठे बैठे,
क्या हुआ? क्या शादी तय हो गई और किससे,
अकुलाहट देख कर उन्होंने, इतना कहा मुझसे,
तुम वक़्त पर आ जाना कल, पढ़ाई शुरू करेंगें,
जाने का मन तो नहीं था मगर क्या करती मैं,
अनमने ढंग से पैर ज़मीं पर रगड़ते चल दी मैं,
मन की व्याकुलता ठहरने नहीं दे रही थी मुझे,
बता देते तो क्या जाता उनका सोच रही थी मैं,
बेसब्री बढ़ती ही जा रही थी इंतेज़ार में कल के,
रात भर नींद करवटें बदलती रही, जानने को ये,
क्या बात हुई होगी बता नहीं रहे, उनके घर पे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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