बेरीनाग की सुंदर अनारकली,
अल्मोड़ा में थी वो पली बढ़ी,
बचपन से थी अत्यंत चुलबुली,
पैर ना टिकते थे एक भी घड़ी,
उछल कूद मौज मस्ती थी बड़ी,
उसको प्यारा दुनिया में हर कोई,
बस घर में अशांति छायी रहती,
पिता गुस्सैल माँ वैरागिनी थी
दोनों के बीच नहीं थी बनती,
पिता के गुस्से व डांट से डरती,
अटपटाये मन से वो घर पे रहती,
कोई ऐसे क्यूँ है जीता, थी सोचती,
माता पिता को ख़ुश देखना चाहती,
दो भाई और इक बहन थी उसकी,
भाई दोनों छोटे और बहन थी बड़ी,
मन करता था उसका उड़ने का,
रास्ता दिखाने वाला कोई ना था,
यही कोई अठ्ठारह की उम्र थी,
दिल में तमन्नाओं की झड़ी थी लगी,
समझ कम और उत्तेजना ज़्यादे थी,
बहुत कुछ करने की इच्छा जगी थी,
विश्विद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ रही थी,
पढ़ने लिखने में वो अव्वल थी,
ख़ासी मेहनत कर आगे बढ़ रही थी,
उसका मन था कुछ अलग सा करने का,
चुन लिया व्यापार प्रबंध करने का,
चूंकि कोई सलाह देने वाला नहीं था,
इसलिये उसे फ़ैसला अपना लेना था,
कहां विज्ञान और कहां प्रबंधन?
पर जब हो दिमाग में असमंजस,
तो फ़ैसले लेने चाहिये आंख बंद कर…
आख़िर यही किया उसने भी,
अपना हस्ताक्षर लिखती वो नंदिनी…
उम्र के साथ साथ सुंदर हो चली,
मासूम लगती थी वो बड़ी भोली,
इसी उधेड़बुन में सोचती खड़ी खड़ी,
तय किया कि वो प्रबंधन ही करेगी,
गठा सुडौल शरीर चपल ख़ासी थी,
खेलों में भी उसकी रुचि काफ़ी थी,
ज़्यादातर खेल उसको थे पसंद,
मगर भाग दौड़ में वो अव्वल थी,
अल्मोड़ा से बेरीनाग बहुत दूर नहीं,
पर दुर्गम रास्ता था जाने का वहीं,
माता पिता से दूर पढ़ाई कर रही ,
घर के हालातों की चिंता धर रही,
बड़ी बहन की हो गयी थी शादी,
घर देखने को वो नहीं थी राज़ी,
भाई छोटे बेरीनाग में थे पढ़ते
रोज़ घर के कलेश थे वो झेलते,
नंदिनी समझदार साफ़ दिल की,
जानती थी वो घर की स्थिति,
मां जो वैरागिनी बन गयी थी,
पिता को चिंता कम थी घर की,
दोनों के बीच बातचीत नहीं थी,
फिर भी ज़िंदगी चल ही रही थी…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava