ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : कुर्ग का ज़िक्र!!! भाग ५
नंदिनी : कुर्ग का ज़िक्र!!! भाग ५

नंदिनी : कुर्ग का ज़िक्र!!! भाग ५

दक्खन के चबूतरे कूर्ग में परिवार था बसा,
उत्तर के काशीपुर शहर का था रहनेवाला,
मां पिता इक बेटी इक बेटे का संसार उनका,
जंगल संरक्षण विभाग में पिता का तबादला,
इसी वजह से बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा,
शुरू हुई कूर्ग के इक अंग्रेज़ी पाठशाला,
लड़के का नाम आदित्य, था भोला भाला,
पढ़ने में तेज़ लड़की को बुलाते थे मीरा,
आगे की पढ़ाई की आदित्य ने इलाहाबाद से,
मीरा ने दाख़िला लिया दिल्ली अफ़ अम एस में,
दोनों ही प्रखर बुद्धि के दोनों ही निखरते गये,
पढ़ाई पूरी करके आगे की तैयारी में जुट गये,
इलाहाबाद बहुत बड़ा केंद्र था पढ़ाई का,
आदित्य को तैयारी करनी थी भा• प्रा• से• का,
बढ़ते गये उसके क़दम उसने किया उत्तीर्ण,
भा• प्रा• से• के शीर्ष पर उसका हुआ चयन…
उसकी बहन मीरा भी कुछ ना थी कम,
प्रबंधन की पढ़ाई पूरी कर उसका हुआ चयन,
उसको मिला अवसर अमरीका जाने का,
शेल कंपनी में मौका था उसे नौकरी करने का…

शिवांगी के मन में जा बसा था प्रणय,
उसको लगता था होगा उसका विलय,
इस ताल पर बैठा, बैठी वो अपनी लय,
हालांकि हालातों के बदलते तेवर तय,
आख़िर जब वो दिन भी आ गया,
प्रणय कुछ दिनों के लिये घर आया,
शिवांगी जो सोचती थी है उसकी छाया,
उससे मिल बयान करने का मन बनाया,
शाम को पगडंडियों पर साथ टहलते हुये,
शिवांगी ने कंपकपाते दिल के बोल कहे,
बोली मैंने सौंप दी डोरी तुम्हें, तुम हुए मेरे,
मन ही मन में करने लगी हूँ प्यार तुमसे,
सोचा अब ना ठहरा जायेगा बिन तेरे,
प्रणय को था आभास कि ये है होनेवाला,
मन ही मन वो तैयार कुछ कहने जा रहा,
शिवांगी का हाथ थाम अपने हाथ,
बोला हौले से वो बस इतनी बात,
तुमसे ज़्यादे कोई मुझे नहीं समझ सकता,
तुमसे हँसीन जीवनसाथी हो नहीं सकता,
पर मुझे दोस्त चाहिये जो टोक सके मुझे,
जो कह सके मुझे तुम बनो किसी काम के,
बोले मुझसे भले ही तुम मेरे प्रिये,
पर हर क़दम पे जो सवाल उठेंगे,
देने पड़ेंगे जवाब तुमको उन सबके,
निष्ठा इक अभिव्यक्ति, सभी को चाहिये,
हमसफ़र वो जो मेरे वजूद को झंझोरे,
सुन कर दिल बैठ गया था शिवांगी का,
हौसला बांध वो बोली दो मुझे इक मौका,
जबकि वो दिल से जानती थी ये नहीं होगा,
प्रणय ना उसका था ना कभी भी होगा,
दोनों के बीच ख़ामोशी तैरती रही देर तक,
शिवांगी प्रणय का अध्याय यहीं हुआ ख़त्म,
बहुत कचोटा था प्रणय ने अपने आप को,
कई दफ़े सोचा क्या सही हुआ उस शाम को,
शिवांगी थी मन की सुंदर और परिपक्व,
क़िस्मत का अच्छा सा फैसला यह समझ,
फिर कभी भी ना पुकारा प्रणय को उसने,
सुना था उसका विवाह हुआ अच्छे घर में…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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