कई दिनों बाद वो थी पहली मुलाक़ात,
जितने शांत दिख रहे, थे उतने ही अशांत,
कुछ ऐसा बीच दोनों के, जो परे जज़्बात,
फिर भी कही ना जा रही दिल की बात,
आख़िर कौन करे पहल कौन करे शुरुआत,
वहां खड़े खड़े निकल गयी सदियों की बारात,
मन ही मन वो दोनों थे इकदूजे के साथ,
कल्पनाओं में थाम लिया इकदूजे का हाथ,
हाय! क्या ख़ामोश पल थे क्या थे हालात,
कशमकश में दोनों, ख़त्म होने को मुलाक़ात,
खड़े हुए दोनों सोचते ये क्या कम था कि मिले,
ना जाने ये पल ये वक़्त फिर मिले ना मिले,
इक टीस उभरती जा रही थी भीतर उनके,
आज के बिछड़े फिर कभी मिले ना मिले,
इसी उधेड़बुन में शाम ढलने को हो चली,
इक को जाना मसूरी दूजे को दिल्ली,
मगर ये बात दोनो ने के इकदूजे से छुपाई,
भगवान ही जाने क्या हो आगे राम दुहाई,
बड़ी देर तक दोनों यूँही मौन खड़े रहे ,
कॉफ़ी और चाय के दौर पे दौर चलते रहे,
कितने हँसीन थे वो पल और वो समाँ,
झील के किनारे की बहती हुई ठंडी हवा,
थी वो कितनी मीठी सी शाम क्या फ़िज़ां,
लगता था वक़्त भूल गया है खिसकना,
हल्की हल्की रात थी हो चली,
हवा भी होने लगी थी मनचली,
झील लगी थी चमकने बिजलियों सी,
परिंदे भी उड़े जा रहे थे घर को जल्दी,
माहौल में बस रही थी थोड़ी खलबली,
पहाड़ों में रात होने को होती है जल्दी,
ठंड ने अपनी चादर शुरू कर दी फैलानी,
अपने अपने ठिकानों को जाने लगे सैलानी,
इधर दोनों बे ख़बर इस बात से खड़े थे ही,
कि अचानक ज़ोर की बिजली कौंध पड़ी,
इस गरज के बीच दोनों की तंद्रा टूटी,
और नज़र गयी उनकी अपनी अपनी घड़ी,
बोली नंदिनी धीरे से, बहुत देर हो चली,
प्रणय उसके गंतव्य छोड़े कहना थी चाहती,
समझ गया प्रणय उसकी आंख के इशारे से ही,
बोला मैं छोड़ देता हूं तुम्हें बहुत देर हो गयी,
चाय वाले के पैसे दे कर दोनों थे चल पड़े,
पहाड़ी के पार था उसका वास, दुर्गम रास्ते,
दोनों कुछ देर तक यहां वहां की बाते करते,
थोड़ा ख़ामोश रह कर फिर बोल पड़ते,
जान पड़ता था ख़त्म ना होगें ये सिलसिले,
चाहते यही वो भी पर जुटा नहीं पाते हौसले,
वजह यही थी कम ना होते उनके फ़ासले,
नंदिनी का वास आ गया, तेज़ हुई धड़कने,
समझ ना पाये क्या कहें दोनों थे अनमने,
कुछ कह ना पाया प्रणय सिवाय नमस्ते,
नंदिनी भी ना बोली पायी, हलक़ थे सूखते,
इशारों में विदा कर प्रणय चल दिया वहां से,
नंदिनी भी अचकचा कर गयी अपने रस्ते,
वापसी के समय प्रणय जा रहा सोचते हुए,
कहना चाहा था नंदिनी से होंठ चुप क्यों रहे,
अब क्या ही फ़ायदा अब क्या ही कहने,
अब कब हो मुलाक़ात कब कहेंगे उससे,
नंदिनी के दिल की कैफ़ियत कुछ थी ऐसी,
जैसे बिन किसी संगीत के धुन हो बज रही,
मन उसका गुनगुनाता अनजानी सी खुशी,
दिल कहता कभी ना कभी मुलाक़ात होगी,
इन ख़ूबसूरत सवालों के बीच दिन शुरू हुए नये,
नंदिनी चल दी दिल्ली प्रणय के पांव मसूरी पड़े…
उनकी इक नये सिरे से हुई शुरुआत, नया अध्याय
पी एच डी करने लगी वो दिल्ली विश्वविद्यालय,
प्रणय भी पहुंच गया था मसूरी वन विभाग,
मिला काम पेड़ो की आबादी की रखरखाव,
कार्य क्षेत्र मुक्तेश्वर के जंगल व कृषि अनुसंधान,
इतना ख़ुश हुआ प्रणय अपना कार्यक्षेत्र जान,
जल्दी ही वह पहुंच गया अपने गंतव्य स्थान,
किराये पर लिया उसने दो कमरों का मकान,
इकदूजे के संपर्क से दूर दोनों कर रहे काम,
फिर भी ना दिन को चैन ना रातों को आराम,
पता भी ना लिया था उन दोनो ने एकदूजे का,
क्या मिलन सम्भव होगा नंदिनी प्रणय का…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava