भाग्य का लिखा कभी टल नहीं सकता,
अच्छा है या बुरा ये बस समय को पता,
हां जाने अन्जाने ही ये फल है कर्मों का,
ग़र शिद्दत से किया तो जो चाहा वो मिला,
उसके मिलने में देर भले ही हो जाये ज़रा,
ध्यान जो बीच में टूटा तो सब रह गया धरा…
पहली दफ़ा पर्यावरण मंत्रालय में काम मिला,
आदित्य को लगा उसका फ़ैसला सही निकला,
अविवाहित सरकारी अधिकारियों का आवास,
आजकल उसका घर यही था नये थे अंदाज़,
काम हो गया शुरू उसका ज़ोरशोर से,
शाम ढले फ़ुर्सत में वो निकलता था टहलने,
इक दिन की बात है, आदित्य को था जाना,
दिल्ली विश्वविद्यालय में उसको था मिलना,
प्रोफेसर पांडेय से था काम इस सिलसिले में,
कोई तरीक़ा है क्या जो वनस्पतियों को समझें,
प्रोफेसर पांडेय थे तो इक मनोवैज्ञानिक,
पर उनका शोध था वनस्पतियों का जीवन,
नंदिनी मिलने आई प्रोफेसर से दौरान उसी,
प्रो पांडेय के निहित वो कर रही थी पी एच डी,
शालीनता से प्रो ने मिलवाया आदित्य से,
औपचारिक नमस्कार हुआ उन दोनों में,
फिर अपना काम कर आदित्य चला गया,
नंदिनी भी व्यस्त समय का पता ना चला,
पहली ही नज़र में उसे नंदिनी गयी थी भा,
आदित्य भी था सुंदर सुडौल शरीर वाला,
इस तरह उसका शुरू हुआ आना जाना,
ढूंढ़ता वो बात आगे बढ़ाने का बहाना,
नंदिनी थी इस सबसे बे ख़बर अन्जान,
लगी हुई थी पढ़ाई करने में पूरी जी जान,
चूंकि अपने मिजाज़ से थी वो बिंदास,
पढ़ाई के सिवा भी उसके थे कई अंदाज़,
उसका मन लगता कला नृत्य व नाटक,
अक़्सर वो जाती थी मंडी हाउस तक,
वहां समय बिताना लगता उसको अच्छा,
दोस्तों की टोली संग जाती वो उस रस्ता,
इक दो बार की मुलाक़ात में हुई पहचान,
साथ बिताये कुछ पलों में होता हुआ संज्ञान,
दोनों की अक़्सर वहां मुलाक़ात हो जाती,
थोड़ा समय साथ बिता फिर होती विदाई,
कुछ हफ़्तों तक ये सिलसिला रहा चलता,
समय साथ बिताना दोस्तों संग अच्छा लगता,
आदित्य अब हर रोज़ शाम को देखता घड़ी,
नंदिनी से मिलने की इच्छा प्रबल होती गयी…
मस्तमौला प्रणय काम करता और मौज भी,
ख़ूबसूरत छोटा शहर है मुक्तेश्वर भी बेहद ही,
बहुत पुरानी दुकान है वहां चॉकलेट बनाने की,
नायाब व ख़ास चॉकलेट बनाते हैं बड़ी महंगी,
ख़ासे कम पैसे होते थे जेब में प्रणय की,
वो ख़रीद लेता इक दो चॉकलेट कभी कभी,
स्वाद लेते लेते वो निकल जाता टहलने को,
जंगल में मन रमता उनसे बातें करता वो,
शाम ढले सूरज ढलने का वो मनोरम दृश्य,
सुबह सवेरे का सूरज इंगित करता भविष्य,
इतनी सुंदर सज्जा प्रकृति की फैली चहुं ओर,
इससे ज़्यादा सुंदर धजा क्या होगी चितचोर,
स्याही से काली रातों में आकाशगंगा खिले,
खिड़की पे बैठे देखे वो लाखों प्रेमी मिले,
इन्ही मनोरम दृश्यों और परिदृश्यों के बीच,
याद जब आती नंदिनी जगती मीठी टीस,
उसकी यादों में नंदिनी बसी हुई कुछ ऐसी,
ज्यूं रजनीगंधा सांसों में उतर रही महकती…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava