जब गहरी नींद से ताज़ा उठी नंदिनी,
याद आया दादी कुछ कुछ कह रही,
पूछा उसने दादी से आप क्या कह रही,
आपकी गोदी में नींद प्यारी आ गयी,
बोली दादी ग़र दिमाग़ में है कशमकश,
हमेशा सुनना दिल की फिर तय कर,
बिजली चमक गयी नंदिनी की आंखों,
सही कहा दादी ने दिल को ना आंको,
उठ खड़ी हुई नंदिनी कुछ करने को,
सोचा अब हूं यहां तो हो आऊं कहीं तो
बचपन की दोस्त रहती थी मुंसियारी,
बर्फ़ की चोटियों के पास थी जगह प्यारी,
कुमकुम नाम था उसकी दोस्त का,
बड़े से घर से हिमालय साफ दिखता,
दादी को बता कर नंदिनी चली उधर,
कुमकुम को ये ख़बर भिजवा कर,
दोपहर वो पहुंचेगी कुमकुम के घर,
यह रास्ता बड़ा मनोरम और सुन्दर,
मुड़ती सड़कों पे इकदूजे से टकराकर,
कभी इधर लुढ़के तो कभी उधर,
ये सिलसिला चला मुंसियारी तलक,
दो बजे के क़रीब नंदिनी उतरी बस से,
सामने खड़ी, कुमकुम मिली हंस के,
सालों बाद हुई मुलाक़ात इकदूजे से,
दोनों मिले गले रुख़ से अश्क़ बहते रहे,
ठंड थी इतनी की गाल गुलाबी हो चले,
अश्क़ों से लगी ठंड गले ख़राशने लगे,
छोटा सा क़स्बा, दो हज़ार लोग रहते,
सब जानते इकदूसरे को सब मिल रहते,
आहिस्ते पग भर नंदिनी कुमकुम चले,
मिनटों में पहुंच गये कुमकुम आशियाने,
घर वालों से कर दुआ सलाम व मिल के,
कुमकुम उसको ले आयी अपने कमरे,
चाय नाश्ता करके अब दोनों अकेले,
बातों के अनगिनत शुरू हुए सिलसिले,
उधर आदित्य हो रहा था परेशान वहां,
ढूंढ रहा वो नंदिनी को जाने कहां कहां,
जल्दी में नंदिनी भूल गयी किसी को बताना,
किसी को कैसे चले पता कहां ठिकाना,
आदित्य गया विश्वविद्यालय पूछने प्रो• से,
प्रो• को भी ख़बर नहीं नंदिनी कहां जाने,
बहुत पूछताछ से पता चला आदित्य को,
दादी बीमार इसलिये नंदिनी गयी घर को,
मन नहीं लग रहा था आदित्य का यहां,
उड़ के वो पहुंच जाना चाहता नंदिनी जहां,
उसका मन अपने काम में नहीं लग रहा,
बिन जल तड़पे जैसे मछली वो तड़प रहा,
कर कुछ भी नहीं सकता सिवाय इंतेज़ार,
इस जुदाई ने उसका गहरा दिया था प्यार,
मन ना लगने की बीमारी का किससे करे ज़िक्र,
केवल बहन उसकी मीरा करती उसकी फ़िक्र,
थक हार कर उसने मीरा को लगाया फ़ोन,
अमरीका में बैठी मीरा हो गयी ज़रा बेचैन,
बड़ी तफ़सील से आदित्य ने सारी बात कही,
मीरा ने गंभीरता से उसकी सारी बात सुनी,
बोली मीरा आदित्य से क्या तुमको है विश्वास,
ख़ास समझते हो उसे, क्या तुम हो उसके ख़ास,
आदित्य इक पल को हो गया हक्का बक्का,
नंदिनी से उसे नहीं इस बात का कभी पता चला,
कि क्या वो है नंदिनी के लिये उतना ही ख़ास,
जितना वो समझता और उसको था आभास,
नहीं कह पाया वो मीरा से नंदिनी क्या सोचती,
पर उसको इतना ज्ञात वो नंदिनी बिन कुछ नहीं,
अब क्या करे वो इसका दिल नहीं उसके बस में
उसको कुछ ना सूझता वो कहीं मन ना लगा सके,
नंदिनी को गये हुए अब हो गये थे काफ़ी दिन,
धीरे धीरे बटोरने लगा वो जीवन के पलछिन,
उसने फिर उत्तेजना दिखाई अपने कार्यक्षेत्र में,
भूल चला था वो बिछोह के सारे दिन याद में,
यूं तो उसको याद आती नंदिनी हर पल में,
प्यार की आस होती है बड़ी हर इक जीवन में,
आदित्य ने कर लिया व्यस्त नहीं करता आराम,
सारे समय लगा रहता वो किसी ना किसी काम,
उसके माता पिता भी आ गये थे उसके पास,
पिता हो गए सेवानिवृत्त रहते थे उसके साथ,
पूरा परिवार था साथ इसलिये खलता ना था,
आदित्य का फिर भी नंदिनी बिन मन ना लगता,
कुमकुम के साथ कुछ अच्छे दिन बीते उसके,
मुंसियारी की ख़ूबसूरती के आगे सब फीके,
ख़ूब ढेर सारी बातें हुईं उन दोनों के बीच में,
चार पांच दिन गुज़रे कैसे पता ना चला उन्हें,
नंदिनी कहना चाहती कुमकुम से सारे किस्से,
पर कोई डोर थी ऐसी जो थी उसको रोके,
मुंसियारी व कुमकुम के बारे में बातें हुईं ज़्यादे,
क्या कहे क्या ना कहे इसी में दिन बीते सारे,
चलने के दिन तक नंदिनी ना कह पायी उससे,
हर वक़्त वो सोचती रही कहे भी तो क्या कहे,
प्रणय हो या आदित्य हो दोनों के ही विषय में,
वो पसंद करते उसे, नहीं जानती सिवाय इसके,
क्या कहती वो कुमकुम से कि कैसे हैं ये रिश्ते,
जिनके बारे में विश्वास से कुछ नहीं कह सकते,
बस जानती इतना आदित्य करता पसंद उसे,
नहीं समझ पाती वो कि क्या आदित्य पसंद उसे,
प्रणय! क्या कहे क्या सोचे वो बारे में प्रणय के,
नैनीताल के बाद तो कोई मुलाक़ात नहीं उससे,
यही सोचते सोचते आये दिन अब जाने के,
नंदिनी सोच रही थी क्या बोले वो कुमकुम से,
कुमकुम भी थी उसकी दोस्त पुरानी क़सम से,
उसने भी नहीं छेड़े कोई भी तार उसके दिल के,
जबकि कुमकुम समझ पा रही थी छटपटाहट से,
कुछ कहने की इच्छा और विवश ना कह पाने के,
कहते हैं कि अच्छे दोस्त होते ही हैं सदा अच्छे,
कुमकुम समझ के भी नज़रंदाज़ कर रही उसे,
नंदिनी ने उसके घर में सब जनों से विदा ले के,
कूच किया दादी घर बेरीनाग की बस पकड़ के,
रास्ते में नंदिनी जा रही थी ये सोचते सोचते,
बहुत दिन हुए उसे यहां अब वापस दिल्ली चले,
काम भी बहुत पड़ा है और भी करना है उसे,
थक के नींद ने आ घेरा नींद खुली बेरीनाग में,
फिर जीप पकड़ के वो पहुंची बिधूड़ी ख़ास में,
दादी कर रही थी उसका इंतेज़ार काफ़ी समय से,
पूछा दादी ने सब ख़ैरियत कुमकुम के वहां पे,
हां में सर हिला इशारा कर दिया दादी को उसने,
अगले दिन वो बोली दादी से अब वापस चले,
बहुत से काम अधूरे पड़े हैं पूरा करना है उन्हें,
क्रमशः:…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava