क्या बात छिड़ी झंकृत हुए तार दिल के,
प्रणय नंदिनी से कह रहा याद ये कर के,
उस दिन जब हम नैनीताल में थे मिले,
क्या पता था हमको हम फिर आ मिले,
जाने क्या लिखा है क्या हो अब आगे,
तुम्हें जब छोड़ूंगा ना जाने फिर कब मिलें,
ये भी कोई बात हुई नंदिनी बोली धीरे से,
पता तुम दो अपना मैं लिखूंगी ख़त तुम्हें,
मन ही मन प्रफुल्लित पता लिखा उसने,
तुम दो पता अपना कह नहीं पाया पर ये,
नंदिनी देख उसकी आंखे समझ गयी सब,
सोचा बिना बताये छोड़ेगी पता उसके घर,
भूख लग रही उन्हें यही कोई दो बजे थे,
इक माकूल से रेस्तरां में दोनों खाने बैठे,
इधर उधर की बात शुरू हो गयी फिर से,
कब बजे तीन वक़्त का पता ही ना चले,
दो दीवाने दिल रस्ता इकदूजे का ताकते,
कुछ कहते नहीं बस आंखों में थे झांकते,
चलने का समय हुआ मन अनमना हुआ,
और भीतर ही भीतर कुछ घटता गया,
ना जाने की इच्छा ना रोकने का साहस,
फिर भी वो आंखे बंधाती थी ढांढ़स,
चला चली की बेला में नंदिनी बोली,
दो मिनट में आई अंदर रह गयी अंगूठी,
पहुंच कमरे में जल्दी से उसने लिखा पता,
फिर वहीं मेज़ पर उसको रखा थोड़ा सजा,
आ गयी वो फट से बाहर चलने को तैयार,
आंसू छलक आये दोनों के जा रहा था यार,
ख़ैर फिर दोनों ही बैठ गए उसकी जीप में,
और चल पड़े वो हल्द्वानी जाने के रस्ते,
नंदिनी कहना चाहती पर कह ना पाती,
आहिस्ते चला गाड़ी जल्दी किस बात की,
प्रणय भी चला रहा था आहिस्ते से गाड़ी,
पर लगता दोनों को दौड़ रही ज़ोरों से घड़ी,
रामगढ़ होते हुए भुवाली पहुंचे पांच बजे,
पूछा उसने नंदिनी से रूक कर चाय पियें,
फट से निकल गया ये नंदिनी के मुंह से,
चलो किसी ढाबे पर रुकते है चाय पीने,
निकलते ही इक ढाबा मिला भुवाली से,
श्रीमान थॉमस का ढाबा था वहीं वे रुके,
चाय का बोल दोनों बैठे ढाबे की छत पे,
वहां से खुली हुई वादियां दिखती सामने,
जाने का समय निकट अब लग रहा उन्हें,
जितनी देर हो सके चाय शाय पीते रहें,
शाम होने को आयी उनके वहीं बैठे बैठे,
अजीब उदासी की छाई परछाईं दोनों पे,
कहना नहीं चाहता था प्रणय कि अब चलें,
मन बना कर बोला पहुंचने में लगेगें दो घंटे,
नंदिनी भी अनमनी सी हो रही मन ना लगे,
कभी कभी दिल जो चाहे वो कर ना सके,
अपने को हताश हुआ समझे मन मार के,
वे दोनों ऐसी ही कैफ़ियत से जूझ रहे थे,
धीमी गति से हल्द्वानी जाने को चल दिए,
काठगोदाम पहुंचे ही थे कि रहा ना गया,
प्रणय बोला ग़र हो सके रूक जाओ ज़रा,
ये बात लगा उसे कि उसने बोली नंदिनी से,
दरअसल ये बात वो कुनमुना रहा ख़ुद से,
सोचते सोचते हल्द्वानी बस अड्डे आ गए,
दिल कचोट रहा पर कुछ कह ना सके,
नंदिनी ने उतारा सामान, बस खड़ी सामने,
दोनों ने देखा इकदूजे की भीगी आंखों में,
बयां से परे थे वो पल, जम गये पैर जमीं पे,
नंदिनी बैठी बस में जा कर भारी मन से,
बैठकर देखती रही प्रणय को वो खिड़की से,
प्रणय का दिल भी धड़क रहा था ज़ोरों से,
तक रहा था नंदिनी को कनखी निगाहों से,
फिर दौड़ता हुआ गया बस में उससे मिलने,
गला भर आया दोनों का पर बोल ना सके,
दो मिनट देख नंदिनी को उतर आया बस से,
पलट कर ना देखा और चल दिया घर अपने,
सिसकियां भर आयी थीं नंदिनी के चेहरे पे,
प्रणय भी बहुत भावुक था गाड़ी चलाते हुए,
कई दिन बीत चुके थे प्रणय को आये हुए,
पर मन उसका लगता नहीं किसी काम में,
बेहद खिंचाखिंचा महसूस करता वो इसमें,
नंदिनी का हाल भी था कुछ मिलता उससे,
पहुंची जब नंदिनी आवास अपने दिल्ली में,
काफ़ी थकी हुई थी वो सोचा आराम कर ले,
हाथ मुंह धो कर वो जो गिरी अपने पलंग पे,
गहरी नींद में वो कब खो गयी पता ना चले,
दोपहर बाद नींद जब खुली थकावट सी लगे,
कुनमुनाते हुए वो कुछ देर पड़ी रही बिस्तर पे,
फिर अनमनी सी उठकर सोचा थोड़ा काम करे,
बहुत दिनों बाद वापसी हुई उसकी दिल्ली में,
अदित्य को जाना था तबादले पर विदेश,
एक साल के काम से भेजा उसे बांग्लादेश,
जाते जाते वो ख़त में छोड़ गया था संदेश,
नंदिनी के घर की खिड़की पर छोड़ा था ख़त,
ये सोचकर कि मिल जाएगा उसे सही वक़्त,
नंदिनी को आने में हुई इक हफ़्ते की देर,
मिला उसे ख़त जब आदित्य जा चुका था,
जो हुआ क़िस्मत से नंदिनी को भा रहा था,
उसे ख़ामख़वाह सोचना नहीं पड़ेगा क्या करे,
वो तो चाहती प्रणय की यादों में डूबी रहे,
हालांकि ये अहसास कि आदित्य चाहता उसे,
ख़ासा परेशान करता रहता था ये ख़ायाल उसे,
इसीलिए वो ख़ुश थी कि आदित्य नहीं शहर में,
अब वो इज़हार करती नज़र नहीं पड़ेगी उसपे,
जान पहचान ठीक है मगर उससे ज़्यादे नहीं,
वो अदित्य से कहना चाहती थी कह ना सकी,
ज़िंदगी दिल्ली में फिर हो गयी शुरू पहले जैसी,
पी एच डी उसे पूरी करनी थी जल्दी जल्दी,
फिर आवेदन देना था लेक्चरर बनने के लिए,
काम शुरू करना चाहती थी वो बस जल्दी से,
इन्ही सब के बीच पहला ख़त आया मुक्तेश्वर से…
बहुत आतुरता से वो ख़त उठाया मोहतरमा ने,
पर खोला नहीं देर तक, ख़त रख तकिया नीचे,
यूँही बैठी सोच रही मजमून क्या होगा ख़त में…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava