ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : रुख़सार पे लाली!!! भाग २०
नंदिनी : रुख़सार पे लाली!!! भाग २०

नंदिनी : रुख़सार पे लाली!!! भाग २०

तय हुआ कि नंदिनी जाएगी दादी घर,
प्रणय ने कहा चलो चलें अब उधर,
बात दोनों की फंसी हुई थी अधर,
क्या जाने क़िस्मत ले जाएगी किधर,
जीप चलाते चलाते हुआ अल्मोड़ा पार,
दो तीन घंटों में वे दोनों पहुंचे दादी द्वार,
उतरकर थोड़ा चढ़कर था घर का किवाड़,
ठक ठक किया नंदिनी ने दो चार बार,
थोड़ी देर में बूढ़ी अम्मा ने खोला घर द्वार,
दरवाज़े नंदिनी को देख उमड़ आया प्यार,
बोली बिटिया अंदर आ जाओ ठंड है बाहर,
नंदिनी ने इशारा कर प्रणय को बुलाया अंदर,
बूढ़ी दादी को बता के बोली है ये मेहमान,
प्रणय को कुर्सी दे किया स्वागत सम्मान,
इतने में नंदिनी जा के मिली दादा दादी से,
देखा प्रणय को दादी ने तिरछी निगाहों से,
जब मेल मिलाप हो गया पूछा दादी ने,
ये क्या वही है बारे में सोचती है जिसके,
नंदिनी शर्मा गयी दादी की बात सुन के,
कुछ नहीं बोली क्योंकि बोलती हैं आंखें,
ना लगी देर मन की बात को समझते,
मोह पाश में बांध लिया दादी ने उसे,
ख़ुशी होती ही है जब बस जाए अपने,
या तब भी जब बसने की बातें करें,
नंदिनी दादी की बातों से बेहद ख़ुश थी,
प्रणय के इज़हार ना कर पाने से नाख़ुश थी,

बिदाई लेने को तैयार प्रणय दादी के घर से,
वजह नहीं बन पा रही थी कि वो वहां रहे,
वो जाना चाहता था नंदिनी से बात करके,
दरअसल ले जाना चाहता था साथ उसे,
नंदिनी थोड़ी देर में ही पास आई उसके,
प्रणय पूछने लगा कि क्या करना है आगे,
नंदिनी थी तो थोड़ी अनमनाइ उससे,
फिर भी बोली थोड़ा समय दो सोचने,
समझ नहीं आ रहा प्रणय को क्या करे,
नंदिनी उसे थोड़ी उखड़ी उखड़ी सी लगे,
औरत के मन को समझना मुश्क़िल है,
ये बात उसे अब समझ लगी थी आने,
नंदिनी को चूंकि लगना था कुछ समय,
सोचा थोड़ा गांव का मुआयना करे ले,
यही सोच वो चल पड़ा कह नंदिनी से,
थोड़ी देर में वापस आयेगा बाज़ार से,

कभी कभी थोड़ी दूरी अच्छी होती है,
ये समझने के लिये कि आगे क्या करें,
यूंही चला जा रहा था प्रणय टहलते,
उसे आदत बात करने की अंजानों से,
गांव में चाय की टपड़ी वहीं सब खड़े,
उसने कइयों से तो सम्पर्क जोड़ लिये,
लगा खड़ा हो कर वहीं सबसे बतियाने,
क्या क्या बात हुई ये तो ख़ुदा ही जाने,
उसी दौरान उसके मन में विचार कौंधे,
चला वो नंदिनी के घर उल्टे पांव औंधे,
शाम हो चली थी हवा ठंडी बह रही थी,
प्रणय पहुंचा पग भरते नंदिनी के घर,
बोला मिल के नंदिनी से चल चलें घर,
घर? सोचने लगी नंदिनी किसका घर?
प्रणय ने क्यों बात छेड़ी क्या सोचकर?
बड़ी सहजता से बोला प्रणय चलो घर,
दो पल में नंदिनी की दुनिया गयी बदल,
आंखों में खुशी के मोती झरझराने लगे,
ख़ुश हो के जैसे पक्षी अपने घर जाने लगे,
नंदिनी ने देखा प्रणय को फिर ग़ौर से,
जैसे कहना चाह रही हो उसे बड़ी देर से,

फिर दोनों के बीच ख़ामोशी लगी तैरने,
बिन कहे ही खुल गए फिर राज़ दिल के,
जल्द ही बहाना बना उसने कहा दादी से,
कि उसे जाना है कल ही, काम बाक़ी हैं,
दादी सबकुछ समझ रही बोली धीरे से,
कि जिस काम की जल्दी हो रही तुम्हें,
उस में जल्दबाज़ी काम नहीं करती है,
इकदम लाल हो गये रुख़सार नंदिनी के,
शर्मा गयी कुछ कह ना सकी दादी से,
अगले दिन जब हुआ समय चलने को,
प्रणय ने दादी दादा के पैर छुए बढ़ के,
आशीर्वाद देके बोली दादी खुश रहिये,
जो करना है काम उसे जल्दी कीजिये…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *