नंदिनी अनिभिज्ञ की प्रणय है दादी के साथ,
भाई के साथ जाने को हुई वो खजूरी खास,
दो ढाई घंटे में पहुंच जाएगी वो दादी पास,
उसे क्या मालूम कि वहां के बदले अंदाज़,
प्रणय भी तड़के सवेरे आया दादी कमरे में,
उसे तो बस धुन थी कि नंदिनी का पता चले,
बातों बातों में दादी ने ही ज़िक्र छेड़ा उससे,
नंदिनी से क्या तुम कई दिनों से नहीं मिले,
इतना कहना कि उसके अरमान फूट निकले,
पर बात हलक़ तक आई, ज़ुबां से ना निकले,
किसी तरह से प्रणय ने रोके उद्गार दिल के,
बस कहा इतना कि क़ाफ़ी समय से नहीं मिले,
दादी को उसकी चुटकी लेने में आ रहे थे मज़े,
बोलीं कि नंदिनी ने भी ज़िक़्र नहीं किया उनसे,
प्रणय क्या ही बोलता चुप बैठा समीप उनके,
फिर चाय वाय पी कर बोला ज़रा सैर कर ले,
वापस आने के बाद वो जाएगा घर अपने,
दूर निकल गया वो सुंदर रस्ते चलते चलते,
शायद तीन या चार कोस दूर था दादी घर से,
पर मोहक नज़ारों के बीच पैर नहीं थम रहे,
वो चलता गया उस पग पर आगे ही आगे,
चलते चलते रूका वो इक ख़ूबसूरत मोड़ पे,
चाय की टपड़ी देख मन किया कि चाय पिये,
वहीं खड़े उसे नंदिनी की याद लगी कचोटने,
नंदिनी जब पहुंची दादी घर बिना इत्तेला दिये,
पहले समझी नहीं दादी फिर समझ गईं मसले,
प्यार से नंदिनी ने सर रखा दिया दादी गोदी में,
और यकायक ही उसके आंसू बह निकले,
चूंकि दादी समझती थी उसकी कैफ़ियतें,
समझते देर ना लगी कि वे है दिल हारे बैठे,
मुहब्बत आसानी से बयां कब है हो पाती,
सारे गहने फीके रह जाते चाहे हो हीरे मोती,
नंदिनी का दिल ना करे कि दादी पास से हटे,
इसीलिए दादी भी चुप बैठी रही साथ उसके,
चूंकि दोनों तरफ की ही कहानी मालूम उन्हें,
और इस बात पे आनंद लेने के अपने मज़े,
नंदिनी के गाल सहलाती बोली दादी धीरे से,
ये वही लड़का है जिसके बारे मे पूछा पहले,
कुछ कह ना सकी बस सर हिला दिया हां में,
तबतक बूढ़ी अम्मा चाय नाश्ता आयी ले के,
बिटिया के सर हाथ फिरा बोली चाय पी ले,
देखा है उसने चुलबुली नंदिनी को बचपन से,
इसीलिए क्या हुआ है समझ नहीं पा रही है,
बूढ़ी अम्मा थोड़ा परेशान नंदिनी को देख के,
किसी की बुरी नज़र लग गयी लगता है इसे,
नज़र उतारो इसकी बूढ़ी अम्मा बोली दादी से,
दादी ने कहा मुझे मालूम है किसकी नज़र है,
ये सुन नंदिनी और छुप गयी दादी के पल्लू में,
नंदिनी ने मां को फ़ैसला बताया नहीं खुल के,
और मां उसकी पड़ी रही इसी असमंजस में,
बहुत अच्छा सा रिश्ता आया है उसके द्वारे,
अब उसकी हां हो तो हां करें, वरना नकारें,
कोई ऐसा माध्यम भी ना था उस ज़माने में,
कि ख़बर कर के पूछ लें क्या हैं इरादे तुम्हारे,
पिता भी उस दौरान पूछ रहे थे उसकी मां से,
किसी तरह रिश्ते की बात टाली गयी उनसे,
ये कह कर कि नंदिनी से पूछ सूचित करेंगें,
विदा ली उन्होंने पुराने दोस्त के परिवार से,
तरुण को नंदिनी भा गयी थी मन ही मन में,
जाते जाते उसने कह ही दिया मां पिता से,
तरुण के पिता का नाम किशोर भट्ट है,
उन्होंने बोला नंदिनी के पिता अपने दोस्त से,
ग़र नंदिनी राज़ी है तो ब्याह में देरी ना करें,
और कहा कि दोनों ही अतुलित जोड़ी लगेंगे,
तरुण को नंदिनी भा गयी है पहली नज़र में,
दरअसल उसका पूरा परिवार ही चाहता उसे,
विदा ली किशोर भट्ट के परिवार ने ये कह के,
हो सके तो नंदिनी से पूछ के जल्द तैयारी करें…
अभी दादी ने बताया नहीं था कुछ भी उसे,
नंदिनी इक अनकही उदासी से घिरी थी कबसे,
उसके ज़हन में ढेरों ख़याल रहे चढ़ते उतरते,
उसकी इच्छा तीव्र हो गयी मिलने को प्रणय से,
बूढ़ी अम्मा को इसी बीच बुला भेजा दादी ने,
आने पर पूछा कि नाश्ते में क्या बनाया है,
बोली बूढ़ी अम्मा धीरे से कान में दादी के,
छन्नू गया है बाज़ार से ताज़ी तरकारी लेने,
सोचती हूं बिटिया के लिए साग पूड़ी बना दे,
देखो तो वैसे भी एक हड्डी की हो गयी है,
और फिर वो जो रुके हैं ऊपर वाले कमरे में,
उनके लिए भी तो नाश्ता बनाना है अच्छे से,
अचानक ये सुन के नंदिनी के कान खड़े हुये,
दादी की गोद से उठ पूछा अजनबी के बारे मे,
दादी कुछ सकपका सी गयी दो पल के लिये,
अहसास ना था कि बूढ़ी अम्मा छेड़ेगी ज़िक़्र ये,
कौतूहलता से नंदिनी हो रही बेसब्र ये जानने,
कि ऐसा कौन ठहरा है जिसे वो ख़ुद ना जाने,
फिर सवाल दोहराते हुए पूछा उसने दादी से,
अबतक दादी तैयार हो चुकी थी उसे बताने,
बोली इक जानकर का बेटा है दादा का तुम्हारे,
कुछ दिनों के काम से रह रहा है घर हमारे,
नाम पूछा बड़ी मासूमियत से दादी से उसने,
दादी फिर इक बार सकपका के बोली रामप्यारे,
नंदिनी ने सोचा, होगा कोई जिसे वो नहीं जानती,
और इससे ज़्यादे जानने की उसकी इच्छा ना हुई,
अपने कमरे में जाने को नंदिनी उठ खड़ी हुई,
साथ ही साथ वो इक गहरी सोच में थी पड़ी,
जब मिलेगी वो प्रणय से कैसी होगी वो घड़ी,
दादी ने कहा जा कर हाथ मुंह धो ले जल्दी से,
नाश्ता करना साथ में आता ही होगा रामप्यारे,
थोड़ी खिन्न सी हुई वो दादी की बात सुन के,
उसने बोला मेरा क्या ही लेना है रामप्यारे से,
दादी मन ही मन मुस्कुरा रही थी सब जान के,
बोली घर आया मेहमान भगवान समान होता है,
दो चार बातें कह सुन लेगी तो बुरा क्या इसमें,
मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा वो भला आदमी है,
क्या ही कहती नंदिनी इस बात पर दादी से,
वो फट से चढ़ गयी सीढ़ी जाने को अपने कमरे,
उसको अपना कमरा अपना नहीं लग रहा,
कुछ और तमतमा के बोली वो बूढ़ी अम्मा से,
मेरे कमरे में कौन रह रहा जो पता नहीं मुझे,
तुमने मेरा कमरा किसी और को दिया कैसे,
बूढ़ी अम्मा चुपचाप सुनती रही नंदिनी के ताने,
शांत हुई तो बोली दादी से पूछो हम क्या जाने,
नंदिनी भी शर्मसार हुई ख़्वामख्वाह ये कह के,
अपना सामान रख ही रही थी कि देखा उसने,
जाना पहचाना सा कुछ रखा हुआ था मेज़ पे,
क़रीब से जा कर देखा भौंचक्की रह गयी,
जो वो देखा उसने वहां क्या सच में था वही…
बूढ़ी अम्मा पानी गरम कर लायी थी तबतक,
नंदिनी से कह कर कि तैयार हो जाये वो अब,
मिजाज़ अच्छा था कुछ देखा था नंदिनी ने,
बहुत ही फुर्ती से तैयार हुई वो जल्दी से,
दादी के साथ नाश्ता करने वो उतरी झट से,
उसको ख़ुश देख कर दादी भी मन मगन हुई,
जाने क्या हुआ है पर अच्छा है, सोच ख़ुश हुई,
हालांकि दादी यह सोच रही थी प्रणय कहां है,
उसे गये हुए अब तीन घंटे से ऊपर हो चुके हैं,
थोड़ी घबराहट भी हो रही थी पर विश्वास था,
इतने छोटे से कस्बे में कोई कैसे ही गुम होगा,
इतने में दादी ने आवाज़ दे कहा बूढ़ी अम्मा से,
नंदिनी आ गयी है अब तो नाश्ता परोस दे,
सब कुछ भुला के दादी नंदिनी खाने लगे,
और उनके बीच बातों के चल दिये सिलसिले…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava