ज़िंदगी की सरजमीं पर...
महफ़िल!!!
महफ़िल!!!

महफ़िल!!!

रतजगा है आज महफ़िल में तेरी,
आज जोग लगा है महफ़िल में तेरी,

आज फिर होगी क़यामत से बातें,
क़ायनात बिखरेगी महफ़िल में तेरी,

तुझसे मुख़ातिब हैं आलम सारा,
कहकशां खुल रहा महफ़िल में तेरी,

चिलमन में टके हैं लाखों सितारे,
पोशीदा हुए जाते हैं महफ़िल में तेरी,

कितने ही नशेमन बनते बिगड़ते,
आ कर आबाद हैं महफ़िल में तेरी,

कइयों को देखा है चमकते हुए,
राज़ ऐसा क्या है महफ़िल में तेरी,

सूफ़ी संत फ़क़ीर गुज़रते रहे,
कुंडी खटखटाते गये दर की तेरी,

फ़रिश्ते उतरते रहे हरसू हर तरफ़,
आहिस्ते उन्होंने दिलों पे दस्तक दी,

मुहब्बत ने कहा मुझको पहचानो,
शिनाख़्त करने लगे अपने दिल की,

क़ाश तू रहे तू, मैं रह सकूं मैं,
आज़ादी हो अपनी बात कहने की,

नियामतें बरसती हैं जहां उसकी,
वो जगह है कहलाती महफ़िल तेरी,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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