सुकूं मिलता उस जगह,
जहां निःशब्द हो आ बैठा,
अ उद्गम म से उपासना तक,
बीच बोलचाल में उ है बैठा,
अ बाण है म धनुष हो रहा,
उ अक्षर प्रत्यंचा रहा चढ़ा,
सावधानी से बोलिये बोल,
छूट प्रत्यंचा से दिल पे लगा,
मुंह खुला तो अ निकला,
म से बंद और उ बीच बैठा,
ॐ का उच्चारण भला,
ॐ से निर्गुण हो चला,
आकार साकार निराकार,
जहां मिला अवतार बना,
अ उ म से मिल ॐ बना,
स्वर निकला जीवन चला,
उद्गम फिर अंत तक चला,
अंत से अनंत, आरम्भ हुआ,
ॐकार को समझना चाहा,
समझा कि उसका नहीं साया,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava