इक कश्ती बहकती रही मौजों में,
साहिल को बुलाती रही लहरोँ से,
मौक़ा देख कर निकल है भागती,
लौटना चाहती नहीं वो किनारों पे,
उसे पसँद है दांव खेलना लहरों से,
ये भी कि संभलना लहरों में सीखे ,
इतनी फ़िक्र कोई उसकी क्यों करे,
कि डगमगाने से पहले संभलने लगे,
वो किनारे जो अपने किनारे लग गये,
किसी ने पूछा किसके सहारे लग गये,
क़श्ती तकती रही ऊँची ऊँची लहरोँ से,
देखते देखते उसके साहिल बदल गये,
कई धारों पे किनारे बस टिके हुये,
ज़रा सी ठोकर लगी और गिर पड़े,
वो किनारे जो गहराई नहीं नापते,
उन्हें देखा है साहिल पे डूबते हुए,
समंदर में मौजें भी और साहिल भी,
कश्ती का क्या हो जो लहरें ना रहें ,
तैरती ज़मीं ढूंढ़ती रही साहिल कहीं,
लहरों के बग़ैर साहिल पे लगें कैसे,
जज़्बों की कश्ती को खेते हुए,
दिल ने चाहा मिल जाएं किनारे,
ढूंढ़ता रहा साहिल को हर जगह ,
वो साहिल जो मझधार जा लगे,
“मनु शरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
लाजवाब !
दिल ने चाहा मिल जाएं किनारे,
ढूंढ़ता रहा साहिल को हर जगह ,
वो साहिल जो मझधार जा लगे,
लाजवाब कर दिया… शुक्रिया
Majdhar nice thought