शाइस्ता ही सही आहिस्ता ही सही,
करती रहना हैराँ, हर रोज़ ए ज़िंदगी,
कभी रूठना, मान जाना भी कभी,
चाह के हमें मनाती रहना ए ज़िंदगी,
यूँही इतराना, शर्माना भी तुम यूँही,
ख़ामोश चुप चली आना ए ज़िंदगी,
जुस्तजू में तू , ज़िंदगी ख़ातिर तेरी,
आवारगी से रूबरू रहना ए ज़िंदगी,
ना किसी ने देखी ना कोई देखेगा ही,
दीवानगी की हदें पार कर ए ज़िंदगी,
नहीं कोई तेरे जैसी कभी भी कहीं,
हैरान हूं, तू और हैराँ कर ए ज़िंदगी,
देख मेरी, ये तड़प और ये क़शिश,
ख़्वाहिशों से भरी रहना ए ज़िंदगी,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत अच्छी लिखी है।
बहुत ख़ूब ॥