और ना डालिए ज़ोर,
डोर है बेहद कमज़ोर,
बात मनवाने की होड़,
मैं हूं मैं का नहीं तोड़,
दो दो पांच का जोड़,
कोई भी आये मोड़,
चाहे जायें दुनिया छोड़,
नहीं छूटनी तार्किक डोर,
बस मैं जानू जीवन डोर,
मेरे डर का ना कोई छोर,
बीते लोगों की बातें कर,
बीते लम्हों को सानी कर,
उसपर मन गढ़ी चढ़ाकर,
फ़ेहरिस्त ऐसी बना कर,
बाटूंगा जन जन चहुँओर,
अपने मन के मनगढ़ंत डर,
ऐसा डर जिसकी नहीं डगर,
उगलूँगा ढेरों ढेर ज़हर,
आता है लुत्फ़ ये बातें कर,
क्यूं जानू क्या होगा असर,
भवितव्य ख़राब की ख़बर,
कमज़र्फ़ियां ख़ुद की,
मढूंगा दूसरे के सर,
कर गुज़रना यही है ग़र,
कपोल कल्पित अजगर,
शिकंजे में ख़ुद कसकर,
ख़ुद की सांसें रोक कर,
खुद को मज़लूम ठहरा कर,
फैलाना इस बात का डर,
वजूद ख़तम क़ौम ख़तम,
नज़रिया थोपना हर नज़र,
क्या यही ज़िंदगी चाही थी,
के बस डर, बिन बात डर,
हर दिल बसा, डर का शहर…
ऐसा भी तो हो सकता है,
मानना है तो मानू मैं चितचोर,
मन भाव से हो भाव विभोर,
अच्छा भी गुज़रा है बीते कल,
उन बीते लम्हों को याद कर,
आज का समय सुनहरा कर,
भवितव्य सुंदर ऐसा सोचकर,
क्यों ही डालिए दिल पे ज़ोर,
डोर करें मज़बूत, नही कमज़ोर,
सुना है जैसा सोचेगे वैसे बनेंगे,
फिर तो बात साफ़ आती नज़र,
लड़ ख़ुद से, मिटाना अपना डर,
वो डर वो वहम जो बैठा अंदर…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava