हूँ कलाकार, किरदार सोच रहा हूँ,
मुख़्तलिफ़ रँग बार बार भर रहा हूँ,
अख़लाक़ रच के मन से गढ़ रहा हूँ,
ख़ुद को क़िताब की तरह पढ़ रहा हूं,
जब लिखता हूँ तो खोता हूँ पाता हूँ
इस फ़ानी दुनिया में नाटक बनाता हूँ,
(Composit character)
मुरक़्क़ब अख़लाक़ का तख़य्युल हूँ,
गढ़ सका ग़र इन्हें, ख़ुद का क़ायल हूँ,
ज़मीनी दलदल में ऐसा मुब्तिला हूँ
कांटे हैं तो क्या, ख़ुद से आ फंसा हूँ,
क्या करूं यह तय नहीं कर पा रहा हूँ,
किरदार जीना है, ख़ुद को मिटा रहा हूँ,
नज़रिये मुख़्तलिफ़ हैं देखने के सबके,
ऐसे नज़रियों को समझना चाह रहा हूँ,
मुश्किल ही सही पर सीखना चाहता हूँ,
दूर ख़ुद से ही क़िरदार जीना चाह रहा हूँ,
क़िरदारों को बढ़ते देखा है साथ चलते,
अख़लाक़ गढ़ते हुए देखना चाह रहा हूँ,
गैरमुमकिन ना सही पर हैरान ज़रूर हूँ,
सुरूर हूं चढ़ता हुआ, ख़ुद का गुरूर हूं,
उलझन है, मगर ये एहतराम कर रहा हूँ,
क़िरदार को सांसे, मैं आराम कर रहा हूँ,
काला सफ़ेद सुर्ख़ श्याम मैं रंग रहा हूं,
इनसे “मनुशरद” का दीवान भर रहा हूं,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
लाजवाब “किरदार”….