कभी कभी जब दिल आये भर,
क्या ही जाने काहे और क्योंकर,
जाने क्या सोचता रहा रात भर,
है कोई बात के रोता रहा रात भर,
उस रात जश्न बरसता रहा रात भर,
जिसकी सुबह नहीं हुई अभी तलक,
मासूम निगाहों से देखना धिया का,
सिलसिला ये चला, गहरी रात तक,
यकीं हुआ नहीं, है अक़्स धिया का,
आसमां का चांद आज है ज़मीं पर,
सुबह होते होते यूं बदल गया समां,
भारी दिल और ज़ोर नहीं क़दमों पर,
उसके कमरे की चौखट पे खड़े खड़े,
कई दफ़े लगा, के चुलबुली है यहीं पर,
मां पा हूं, दिया है कलेजा काट कर,
ख़ुश हूं, धिया का बसा है अपना घर,
कुछ पल ठहर जाते हैं उम्र भर,
उस पार तक जाएंगे साथ चल कर,
याद उन पलों की, मीठी टीस ठहरी,
ख़ुशी ख़ुशी में जी रोया ख़ूब, जी भर,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
खुश हूं dhiya का बसा है अपना घर
बस खुश रहो। dhi तो हमेशा अपनी ही है।
गंगा नहा लो
बहुत सुन्दर
हर माता ,पिता के दिल की बात है
Isne rula diya tha mujhe
इससे ज़्यादा तारीफ़ और क्या हो सकती है कि लिखा हुआ रुला दे…बहुत शुक्रिया