Copyright © by Manish Kumar Srivastava
एक घर बिना दीवार का,
बड़ी बड़ी खिड़कियाँ,
हैं खुली रहती,
चौड़े से दरवाज़ों पे बड़ी सी,
है चिटखनी चढ़ी,
चैन की घड़ी रहती,
आसमान ताकती दुछत्ती,
पैदल चलने को उसपे
घास है उगा ली,
घर इक पूरी सड़क के बराबर,
आमोदरफ़्त नहीं के बराबर,
हैं बसे बस हम हीं,
बाशिंदे जानदार हैं यहाँ के,
पढ़े लिखे थोड़े सनके से,
ये क्या बात कह दी,
ज़िंदादिल लोगों के बीच यहाँ,
बिना साँसों वाला रहता कोई,
तस्वीर कभी नहीं दिखी,
इक्कठा बैठने का शौक़,
जलसे जैसा माहौल,
महफिलें रहें चलती,
यादों को हमेशा ताज़ा रख्खें,
क़िस्सागोई चलती रहें,
रिवायतें है यहाँ की,
इक घर है, बहते विचारों का,
निरंतर सजग सोचों का,
मीमांसाकता यूँही रहे बनी…
“मनु शरद”
कमाल ही कर दिया। कल बात हुई और आज रचना सामने आ गई। इतना कृतित्व तो अद्भुत है।
बहुत खूब
इसी तरह लिकते रहिये!!! बोहत सुन्दर कविता