है ये शोर का सन्नाटा,
यहां हर कोई भन्नाता,
है ढपली है राग अपना,
औ दूसरों पे चिल्लाता,
है ये शोर का सन्नाटा…
दरवाज़े पे कान लगाता,
आवाज़ें सुन नहीं पाता,
टूटा फूटा जो सुन आता,
नमक मिर्च लगा बताता,
है ये शोर का सन्नाटा…
हलवा पूड़ी औ बताशा,
ये दुनिया है इक तमाशा,
तू ग़लत मैं सही बताता,
मुझको सबकुछ है आता,
है ये शोर का सन्नाटा…
इक़दम सही मेरा नज़रिया,
हम हैं बस हम हैं की दुनिया,
इसमें खोट तुम्हें क्यों दिखता,
क्यों तू ओट में छुपकर रहता,
है ये शोर का सन्नाटा…
मन चाहे ना चाहे सुनना,
सुनना तुझको रहेगा पड़ना,
तूने क्यों अब तक नहीं सुना,
मैंने जो कुछ अभी अभी कहा,
है ये शोर का सन्नाटा…
मेरा तुझसे है क्या नाता,
मुझे तू फूटी आंख ना भाता,
गहरे काले चश्मे है बनवाता,
और रहे फिर आंख चुराता,
है ये शोर का सन्नाटा…
सुन अब जो मुझको है कहना,
ज़ुबान ने सीख लिया लिखना,
लिख लिख के अब हूं मैं कहता,
इसलिए मैं कुछ भी कह सकता,
है ये शोर का सन्नाटा…
है यहीं पर सभी का खाता,
कोई मगर समझ ना पाता,
कहते मनुशरद सुन भ्राता,
पीछे पगहा ना आगे नाथा,
ईश्वर ने भी पकड़ा माथा…
है ये शोर का सन्नाटा…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava