ठंड पड़ रही है,
बर्फ़ गिर रही है,
सर्द हो के सांसे,
धुआं बन रही हैं,
हाथों की जुंबिश,
नम पड़ रही है,
थरथराते होंठों पर,
कंपकंपी चढ़ रही है,
पानी की बूंदों पे
बर्फ़ सी जम रही है,
नशीली अलकों पे,
ओस चमक रही है,
शरारतें ज़िंदगी से,
कुछ ज़्यादे बढ़ रही हैं,
ज़िंदगी की बाहों में,
ख़ुमारी सी चढ़ रही है,
गर्मजोशी बढ़ रही है,
ठंड सर पे चढ़ रही है,
ईधर साल बदलने की,
क़वायद चल रही है…
लो बदल गया साल,
पहन की नई छाल,
ज़हन में भर के मस्ती,
ज़िंदगी मचल रही है,
कुछ अलहदा करने की,
जाने क्यों, ज़िद कर रही है…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
नववर्ष की इस पावन बेला पर आपको ढेरों शुभकामनाएं। आप द्वारा रचित सुंदर छुई-मुई कविता के अनुमोदन से लग रहा है कि कवि ठंड से परेशान है और मेरा सुझाव है कि ऐसे मौसम में एकबार मधुशाला का दौरा अवश्य करें, ऐसा करने मात्र से कविता में और परिपक्वता आएगी।
क्या बात कही है, इसी से गर्माहट की अनुभूति होने लगी…
नए साल का आगाज हो ही गया है , चलिए अलहदा ही सही लेकिन कुछ तूफानी करेंगे ।
नए साल की मुबारकबाद ।
बहुत उम्दा । नया साल मुबारक हो ॥
Bahot khoob.. kavita padane se thand ka ehsaas aur bad sa gaya….
बहुत खूब