ज़िंदगी मद्धम मद्धम सी,
गुनगुनाती चली जा रही,
सुनते थे हम ख़ामोश बैठे,
अकेले में आकाशवाणी,
बिना दिए अपनी वाणी,
गीतमाला बिनाका की,
कार्यक्रम विविध भारती,
ग्यारह बजे की सुई,
चुप सारी दुनिया हुई,
ज़िंदगी हमारी शुरू हुई,
ख़त लिखा लिख के पढ़ा,
पढ़ पढ़ के पोथा गढ़ा,
कुछ रंग खींचे शब्दों में,
बखिया उधेड़ी हर्फ़ों की,
हलफ़नामा अपना लिखा,
कुछ कहनी चाही अपनी,
कुछ उनकी सुननी चाही,
कहने को छत की राह ली,
आँखों में थी आस भरी,
आँखों से ही कह डाली,
वो चम्पा की डारी,
वो झूम रही मतवारी
महक़ रही फुलवारी,
उनकी जानिब से देखो,
पूरी कहानी कह डाली,
शाम हो रही मतवाली,
धुंध की चादर छा ली,
अंगीठी जला के तापी,
ख़यालों में गर्मी ढाली,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
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