ओस ठहरी टहनी पर,
टहनी लोच से भर गयी,
ज़रा सी हलचल हुई,
ओस ज़मीं पे टिक गयी,
ज़मीं भी लगी कहने,
ठंड में क्यों कुड़क रही,
ओस ने फिर ओढ़ ली,
मिट्टी चादर फैली हुई,
ओस ने जब ज़मीं छुई,
तबियत उसकी खिल गई,
वो इस मिट्टी में गुँधी हुई,
वो मिट्टी सी ही महक गयी,
ओस है इक आस जैसी,
उंगली के नुक्कड़ पे बैठी,
सूर्यकिरणों से चमक उठी,
उसकी आभा हरसू फैली,
शख़्सियत उनकी ओस जैसी,
मिट्टी से मिली तो महक उठीं
किरण पड़ी तो चमक उठीं,
प्रसन्न, लीन औ निरत रहीं…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत सुंदर कविता है — कोमलता, गहराई और प्रकृति की सौम्यता से भरी हुई। ओस की उपमा से जीवन, भावनाओं और इंसानी शख़्सियत की जो तुलना की गई है, वह बेहद प्रभावशाली है।
हर बंद में एक नई परत खुलती है — पहले ओस की मासूमियत, फिर ज़मीं से उसका संवाद, और फिर सूर्य की किरणों से उसकी आभा… एकदम सहज, फिर भी बहुत भावपूर्ण।
क्या कहने हैं इस विवेचना के…शुक्रिया!!!
Garmi mein Thand ka ehsas