सिलसिला बस यूंही चलता रहे मांगा ईश्वर से मैंने,
बाहर पहुंच के ये बात शायद समझ में आई उनके,
क्या कहें कि थामे हुए हैं हाथ मेरा वो जाने कब से,
यक़ायक़ ही इकदम से हाथ छोड़ दिया मेरा उन्होंने,
और गुस्ताख़ी माफ़ हो के भाव दिखते थे उनके चेहरे,
कैसे कहती,कोई और हाथ पकड़ सकता था यूं मेरे,
मुंह ना तोड़ देती जो कोई आसपास भी फटकता मेरे,
आदमी, शायद ये बात समझ पाते हैं काफ़ी देर से,
कि लड़की हाथ बढ़ाती है तो सिर्फ़ अपनी मंज़ूरी से,
जरा थम के बताया उन्होंने कि हम वहां से क्यों भागे,
ख़ासी चेप हैं वो प्रोफ़ेसर जो बैठी थी कमरे में मेरे,
बातों का सिलसिला चलता रहा काफ़ी देर तक उनसे,
चलते चलते साथ में और सुनते हुए उनसे उनके किस्से,
सुनते सुनते उनके किस्से जाने कहां पर हम आ पहुंचे,
इक दरख़्त के नीचे थे रुके थोड़ी सांस भरने के लिए,
वही किराने की दुकान, जहां देखा उनको पहली दफ़े,
दरख़्त के नीचे खड़े हुए वो भी मन ही मन मुस्कुरा रहे,
पूछना ज़रूर चाहा था हमने ये राज़, मगर हम चुप रहे,
ये उनकी ख़ास अदा है कि वो हौले हौले हैं बोलते,
और शायद राज़ दिल के आहिस्ते आहिस्ते हैं खोलते,
जानती ना होगी तुम, हल्क़ी सी मुस्कान भर कर बोले,
इसी दुकान पर, तुम्हारी पहली झलक देखी थी मैंने,
और मन ही मन लगा था मुझे क़ाश मिलूं दुबारा तुमसे,
अजीब इत्तेफ़ाक़ है हम खड़े हुए हैं साथ उसी मंज़र पे,
थामना चाहता तेरा हाथ उसी दिन से, वो आहिस्ते बोले,
ख़मोशी सन्नाटे की तरह फैलती गई दरमियाँ हमारे,
और हम देर तलक बैठे रहे वहीं उसी दरख़्त के नीचे,
और वो थे मेरा हाथ थामे!!!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava