प्रणय की शिक्षा शुरू हुई बनबसा से,
आगे की पढ़ाई की उसने नैनीताल से,
बारहवीं की थी बिड़ला विद्या मंदिर से,
कला की पढ़ाई कुमाऊं विश्वविद्यालय से,
उसको पहाड़ बहुत ही पसंद, मन आनंद,
अत्यंत आंतरिक अनुभूति से संचित,
प्रणय, हृदय से सोचता था हरदम,
अंकुरित रोमांच से भरपूर उसका मन,
विचरता था ख़्वाबों में हर पल हर क्षण,
सपनों को साकार करने का प्रयत्न,
अपनों के साथ चलने का जतन,
प्रणय की खोज में था गहन चिन्तन,
छोटी उम्र में उसके बड़े बड़े स्वपन,
खुली आंखों से देखता मन मगन,
खुले आसमान के नीचे, ऊपर नीलगगन,
प्रणय के अंदर इक आत्मियता बसती,
अपने मन के आगे उसकी एक ना चलती,
उधर नंदिनी व्यापार प्रबंध का मन छोड़कर,
पढ़ने आगे अल्मोड़ा से नैनीताल आ कर,
उच्च शिक्षा मनोविज्ञान में दाख़िला ले कर,
पढ़ाई शुरू कर दी छात्रावास में रह कर,
इकदिन वाचनालय में बैठ पढ़ रही थी,
उसकी नज़रें किसी अंजान से टकरा गयी,
उस अंजान की आंखें उसी को तक रही,
अचानक मिली नज़रों से दोनों अटपटा गये,
फिर दूसरी तरफ़ देख कुछ सोचने लगे,
इसी उधेड़बुन में पहरों पहर बीत गये,
शाम हो चली थी, जाने की घड़ी थी,
कौतूहलतावश अजीब जिज्ञासा जगी,
प्रणय तो था ही मन का मौजी,
उसे नहीं थी चिंता किसी बात की,
उम्र के उस दौर में था वो जहां कि,
रोमांच और दिल में गुदगुदी लगी,
नंदिनी सुंदर भी थी और सयानी भी,
नज़रों के खेल को अबतक ना जानी,
मन की इस अवस्था से थी अन्जानी,
कि अंकुर प्यार के फूट रहे अज्ञानी,
कुछ दिन यूँही बीत गये सब भूल गये,
सर्दी की छुट्टियों में वे दोनों घर को गये,
नंदिनी सुनती माता पिता की अनबन,
जिससे छुड़ाना चाहती थी वो दामन,
प्रणय तो था दोस्त अपने वालिदैन का,
समय कब गुज़रा उसे पता ना चला,
प्रणय के घर पे आते थे बहुत लोग,
उनमें से इक उसके पिता के दोस्त,
दोनों परिवारों में घरेलू थे संबंध,
शिवांगी नाम, थी प्रणय की हमउम्र,
अच्छे दोस्त थे वे दोनों बचपन से,
और दोस्ती की हदें दोनों थे समझते,
दिल की राह अपने आप है बनती,
इसमें आमतौर पे किसी की ना चलती,
शिवांगी के मन ना जाने कब हुआ,
प्रणय जाने अन्जाने घर कर गया,
मिलती जुलती कैफ़ियत प्रणय की भी,
ना जाने कब कैसे बिन बोले सुन ली,
छोटी उम्र के प्यार की ग़ज़ब अनुभूति,
दुनिया उस बिन अप्रिय सी लगती…
ऐसी अवस्था की व्यवस्था नहीं होती,
थोड़ी सी दूरी सबकुछ है भुला देती…
नंदिनी का भी इक छोटा चमत्कार,
सोलह सत्रह साल में हुआ था प्यार,
पहली बार दिल के अंकुर थे फूटे,
और लगते थे वो खट्टे मीठे,
ऐसी अनुभूति का नहीं कोई विकल्प,
बिना मरे किसको दिखा है स्वर्ग,
जैसे जैसे नंदिनी सयानी होती गयी,
वैसे वैसे उसकी कहानी बदलती गयी,
उसका बचपन का प्यार हुआ फुर्र,
और उसकी कहानी ने ली करवट,
पढ़ने गयी वो अल्मोड़ा बेरीनाग से,
नया अध्याय शुरू हुआ अलग राग से…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava