ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : मुख़्तलिफ़ अंदाज़!!! भाग ४
नंदिनी : मुख़्तलिफ़ अंदाज़!!! भाग ४

नंदिनी : मुख़्तलिफ़ अंदाज़!!! भाग ४

प्रणय को लगता था कि ज़िंदगी,
हर वक़्त गुलज़ार होने को हुई,
पढ़ाई में उसका मन लगता था कम,
कभी कभी वो घूमने निकलता इकदम,
साथ दोस्तों के ख़ुद को पाता अकेला,
उसका मन था इकदम बैरागी अलबेला,
मन के अंदर तक बैठा कि है सब ठीक
निमित्त मात्र चिंता नहीं उसे वो निर्भीक,
बुरा क्या होता है जानता ना था वो,
जानता तो था पर अनदेखा करता वो,
अजीब ओ ग़रीब क़ैफ़ियत का मालिक,
ज़िंदगी उसे देख होती थी संचालित,
इक दिन वो चला जा रहा था दूर,
पैदल चलते चलते रास्ता गया भूल,
पहाड़ों में शाम जल्द होने को आयी,
भूला भटका ढूँढ रहा था आशना कोई,
जब देर हो चली अंधेरा छाने लगा,
थोड़ा डर अब उसको सताने लगा,
गुज़री इक मोटरगाड़ी जब उधर,
हाथ दिखा रूकने का इशारा कर,
बोला नैनीताल जाना है ये बताकर,
जैसे ही चढ़ा वो बस में जा कर,
पीछे की तरफ़ उसे दिखायी पड़ी,
अपने घर से लौट के आ रही नंदिनी,
आंखों ही आंखों में हुई मुलाक़ात,
बिना कुछ कहे हुई अच्छी ख़ासी बात,
दोनों ख़ामोश बैठे रहे सारे रस्ते,
जब पहुंचे नैनीताल थके हुये थे,
कोई भी बात नहीं की थी दोनों ने,
फिर भी कुछ घटा जो वे ना पहचाने,
ख़ामोश थी सड़कें थमा था समाँ,
दोनों को अहसास घटा कुछ दरमियां…

अभी सोच ही रहे खड़े हुए दोनों,
कैसे जाएं वो अपने छात्रावास को,
इक ही रिक्शा कर के गये वो,
चल दिए अपने गंतव्य को,
नंदिनी को छोड़ कर उसके स्थान,
प्रणय पहुंचा देर से अपने निवास,
फिर कई दिन बीते ना हुई मुलाक़ात,
पर दोनों को भूलती नहीं थी वो रात,
अकेला जब होता नंदिनी घूम जाती,
फिर पहरों पहर उसे नींद नहीं आती,
कुछ ऐसा ही हाल था नंदिनी का,
बेहाल कर रहा ख़याल प्रणय का,
ये अहसास दोनों को था ख़ुद से,
अनिभिज्ञ इकदूजे की भावनाओं से,

क्या इन्ही भावनाओं को कहते हैं लगाव
जाने अनजाने इकदूजे की तरफ़ खिंचाव,
दोनों ही उस उम्र में थे जहां कोई सुझाव,
उल्टा पड़ सकता था उसपे जो समझाए,
इसीलिये ज़रूरी हैं अपने, कौन बताए,
दोस्तों के साथ शायद कुछ कह पाए,
दोनों चाहते हैं वही लगन, समझ ना पायें,
इकदूसरे की तरफ़ बिना जाने खिंचे जायें,
है ख़ूबसूरत ये जज़्बात क्या कहा जाये,
किससे कहें कैसे कहें, दर्द मिठास लाये,
इस ख़लिश में दोनों ख़ुश दोनों परेशां,
परेशानी का सबब समझ आये ना भी आये,
हाय रे ये अहसास ज़िंदगी लिये जाये,
कोई करो इलाज कोई तो बताये उपाय,
इक टीस बैठ गयी थी उनके मन में,
जिसका मज़ा वो ही समझे जो हो इसमें,
मुलाक़ात फिर भी ना हो पायी थी दोनो की,
कसमसाती सी अंगड़ाई बन रही ज़िंदगी उनकी…

क्रमशः:…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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