अमलतास गुलमोहर खिल रहा दिल्ली में,
रौशन धूप में खिल रहे थे फूल रंग बिरंगे,
ख़ुशनुमा माहौल था उसपर दिन सुनहरे,
महरौली में दिखे कींकड जंगल अनोखे,
बहुत बड़े पेड़ ना थे पर उनके नीचे घनेरे,
क़ुतुबमीनार लगे है जैसे चौकीदार उसके,
इस तरह के बड़े मुख़्तलिफ़ और अनोखे,
ऐतिहासिक जगह पूरी दिल्ली में देखने,
सड़क लोधी पर इक इमारत आई एच सी,
जगह हर तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की,
चूंकि नंदिनी को था पसंद इनमें थी रुचि,
इसी वास्ते वो यहां आया जाया करती,
कार्यक्रम देखने की आदित्य ने ज़िद पकड़ी,
इतने इसरार पे आख़िर नंदिनी क्या करती,
जा रही थी साथ वो आदित्य को दिखाने,
कमानी छायाग्रह में शास्त्रीय संगीत सुनवाने,
हालांकि आदित्य जाता था मगर सिर्फ़ दिखाने,
मन उसका करता नंदिनी के साथ समय बिताने,
वैसे नंदिनी थी ख़ासी बिंदास क़िस्म की,
पर अपने मन के आगे वो भी मौन रहती,
जो मन कहता नंदिनी वो ही वो करती,
दिल्ली में पढ़ाई करने के बावजूद भी
उसको भाता था कुमाऊं का आंचल ही,
वो भाग कर वहीं पर पहुंच जाना चाहती,
वो चीड़, वो देवदार वो ढेरों पेड़ साल के,
समय गुज़रता कब बैठ उनकी छाया में,
वो झरनों का बनना हर नयी बरसात में,
दूधिया सफ़ेद जल बह रहा था पार्श्व में,
ज्यूं हो श्वेत गंगा निर्मल बहती संसार में,
शांति निश्चिंतता बहती रहती गुलज़ार में,
जाने कब से यूँही बैठी सपने देख रही,
तभी उसके कमरे की घंटी बज पड़ी,
उससे मिलने आया था कोई खड़ा नीचे,
ख़बर आया था देने चौकीदार कमरे में,
थोड़ा संवर के बाल बुहार कर नंदिनी ने,
रुख़ किया नीचे का, आगंतुक से मिलने,
धक से रह गयी जब देखा उसको उसने,
उसका छोटा भाई आया था उससे मिलने,
जल्दी से गले लगा उसे लगी वो बात करने,
भूल गयी कि लंबी यात्रा आया वो करके,
होश आया तो पूछा था उससे नंदिनी ने,
मुझसे मिलने आया या किसी काम से?
विवेक नाम उसका विवेकी वो था भी,
हर बात में संकोच रहता कहने में भी,
ख़ैरख़्वाह पूछने आया था वो नंदिनी की,
भूल गया भूख लगी थी उसको ज़ोरों की,
जब थोड़ी बात हो चली भाई बहन की,
वो बोला लगी है भूख, दीदी, ज़ोरों की,
आवास के पास ही खाने की जगह थी,
दोनों ने वहां बैठ जमकर पेट पूजा की,
खाना खाते खाते नंदिनी थी सोच रही,
थी वो पहाड़ों में, अभी भाई के साथ खड़ी,
सपनों की उड़ान कितनी ऊंची हो सकती,
ग़र सोचना है सपना तो सोचो सिर्फ़ वो ही,
जिसकी राह पे चल कर देखो दुनिया पूरी,
कुछ दिन रुक, हुई विवेक की घर वापसी…
बहती जा रही थी ज़िदंगी नंदिनी की यूंही,
और आदित्य के मन में बसी जा रही नंदिनी,
बांवरा मन बांवरी धड़कन और तुम,
यही कहना चाहता था आदित्य लेकिन,
शब्द होठों तक आते आते हो जाते मौन,
और दिल! कैसे कहे कि दिल है बेचैन,
सोचता रहा वो यूँ ही दिनों दिन,
बढ़ती जाती उसके दिल की धड़कन,
अब उससे बेचैनी हो नहीं रही थी सहन,
वैसे नंदिनी करती थी आदित्य को पसंद,
पर दोस्ती से कम जान पहचान तलक,
नंदिनी समझ रही थी बेचैनी आदित्य की,
उलझन में पड़ी थी आख़िर वो क्या करती,
और कुछ समय बीता बीच इसी अनबन,
दिल का क्या कहिये दिल की अपनी धुन…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava