मिल के यहां प्रणय से उसका है क्या हाल,
मुक्तेश्वर में रहता उन्मुक्त घूमता बुग्याल,
कुमाऊं का कोई स्थान उसने नहीं छोड़ा था,
हिम भूखंडों में खेलना अच्छा लगता था,
बस इस ख़याल से कि कुछ समय बिताता,
उसने नंदिनी से कहा काम उसे है अल्मोड़ा,
नंदिनी भी बेसुध हो रही कुछ भी ना बोली,
ऐसी शक़्ल बनायी उसने लगती बड़ी भोली,
सर हिला कर हां कह कर चलने का इशारा,
प्रणय ने बढ़ा दिया अपनी गाड़ी का पारा,
चूंकि चाहता था प्रणय ज़्यादा वक़्त बिताना,
धीमे गति से चलाते हुए सुन रहे दोनों गाना,
चार घण्टे लगते बस से अल्मोड़ा पहुंचने में,
लगा छह बजे तक पहुंच जाएंगे आहिस्ते से,
मद्धम बारिश की गति तेज़ लगी थी होने,
कारण यही गाड़ी चला रहा था वो धीमे,
नहीं दिखाई पड़ता बाहर गाड़ी के शीशे से,
नंदिनी की जान सूखी हुई थी उन रस्तों पे,
ऐसी घनघोर बारिश नहीं देखी जाने कब से,
थोड़ी घबराई हुई वो सिमट गई थी ख़ुद में,
प्रणय समझता कैफ़ियत चला रहा आहिस्ते,
ख़ामोशी और डर तैर रहा दरमियां उनके,
गाड़ी थी चढ़ाई पर और प्रार्थना नंदिनी करे,
आगे देखा तो बहुत सी गाड़िया पंक्ति में,
भू स्खलन हो गया था वहीं थोड़ी दूर पे,
अब कोई नहीं चारा सिवाय बैठना गाड़ी में,
दोनों की गर्म सांसों से शीशों पे धुंध चढ़े,
बाहर हवा सर्द अंदर सांसों की गर्मी बहे,
इकदूजे को पसंद वो दोनों ही थे करते,
बयां ना होते उनके जज़्बात क्या कहिये,
प्रणय ने छेड़ी बात नंदिनी से पूछते हुए,
क्या कर रही हो आजकल हो किस रस्ते,
कहते कहते देखा उसने नंदिनी को ग़ौर से,
कोई चिन्ह ना देख ख़ुशी से मन लगा झूमने,
पूछा नहीं था उसने बस जाना था अंदाज़े से,
हाथ अभी नहीं थामा था किसी का नंदिनी ने,
नंदिनी ने कहा पी•एच•डी• कर रही दिल्ली में,
और फिर सच बताया कि आई यहां किसलिये,
फिर दो पल की खामोशी बैठ गयी लबों पे,
गाड़ी के शीशों से अब कुछ भी ना दिखाई पड़े,
हाथ से पोंछते हुए शीशा देखा कुछ प्रणय ने,
फिर धीरे से बोला लगता है रास्ता लगा खुलने,
इकदम से दोनों ही हो गये थोड़े अनमने से,
दोनों ही ख़ुश नहीं लग रहे थे रास्ता खुलने से,
देखिये तो दिल की भी कैसी होती है कैफ़ियतें,
जहां हर कोई सोच रहा कि रास्ता जल्दी खुले,
दो दिलों की चाह में, अंजाने ही ये होना खले,
नंदिनी ने पूछा प्रणय से जब आगे चल दिये,
तुम कहां से आ रहे हो इस रस्ते भटकते हुए,
बोला प्रणय गया था माता पिता से मिलने,
आयी हुई थी बहन भी वहां सभी से मिलने,
उसको टनकपुर छोड़ता आ रहा हूं इस रस्ते,
मुझको जाना है…चुप हो गया वो कहते कहते,
नंदिनी बोली चुप क्यों हो गये कहने जा रहे थे,
बोला तुमको अब बस मिलेगी कैसे कहां से,
देर हो जायेगी हमको अल्मोड़ा पहुंचते हुए,
सोच में पड़ गयी नंदिनी कि वो अब क्या करे,
बोली नहीं वो कुछ पर आंखें थी कि बोल पड़े,
अजीब सा विश्वास उसे प्रणय पे जाने कैसे,
शायद लड़कियों को समझ आता ये जल्दी से,
किस पर करना विश्वास, किस पर वो नहीं करें,
हाव भाव से ही समझ जाती हैं लड़कियां ये,
मानवीय भावनाओं का अद्भुत है उपहार उन्हें,
दिल कहता नंदिनी का उसपर वो ऐतबार करे,
बोली प्रणय से क्या कोई विकल्प सूझता उसे,
प्रणय ने तबतक नहीं सोचा था इस विषय में,
कुछ ना कुछ इंतेज़ाम हो ही जायेगा राह चलते,
वैसे भी ढेरों समय बिताना चाहता साथ उसके,
बोला इक विकल्प है कि मैं चलूं साथ तुम्हारे,
हल्द्वानी से मिलती हर समय दिल्ली की बसें,
नंदिनी थोड़ा अचकचा गयी ये विकल्प सुन के,
अल्मोड़ा से हल्द्वानी की दूरी है अच्छी ख़ासी,
प्रणय उसे छोड़ के वापस आयेगा अकेला ही,
अरसे बाद हुई अचानक मुलाक़ात, वो कैसे बोले,
मगर दिल नंदिनी का करता हल्द्वानी वो ही छोड़े,
उसके मन में कौतूहलता वश ढेरों लड्डू फूटे,
अगर साथ प्रणय का मिले यूँही जीवन के रस्ते,
दिल भी क्या क्या ख़्वाब बुनता है बैठे बैठे,
दिल की इच्छा को टाला झंकझोर के नंदिनी ने,
मज़े की बात ये कि दोनों दिल थे साथ तड़पते,
भांप के चेहरा नंदिनी का बोला कहीं हैं रुकते,
चाय वाय पी कर कुछ खाते हैं फिर तय करेंगे,
तक़रीबन आठ बजे थे जब वे अल्मोड़ा पहुंचे,
मशहूर दुकान मिठाई की वहीं पहुंच के वो रुके,
चाय के साथ नमकीन ले कर दोनों बातें करते,
प्रणय ने सुझाव देते कहा दो विकल्प हैं हो सकते,
इक तो हम हल्द्वानी जाएं या फिर रुकें कमरा ले के,
नंदिनी भी लगी सोचने हल्द्वानी पहुंचेंगे सवेरे,
यहीं रूक जाती हूँ निकलूंगी सवेरे सवेरे तड़के,
इक और विकल्प दिया प्रणय ने मुक्तेश्वर चलते,
नंदिनी को बताया उसने वहां उसका घर है,
बोला मैं करता हूँ अनुसंधान मुक्तेश्वर में रह के,
वहां के कृषि अनुसंधान में नौकरीरत हूँ साल से,
जाने क्या कुछ कौंध गया नंदिनी के दिमाग़ में,
मन में विश्वास भरा था प्रणय के विषय में उसे,
सोच रही थी यहां भी रूकेगी होटल के कमरे में,
इससे अच्छा तो होगा रुके वो प्रणय के घर में,
इसी बहाने समय मिलेगा साथ प्रणय के बिताने,
विश्वास वो तब से करती है जब उसको ना जाने,
हिम्मत कर के बोली वो चलते है घर तुम्हारे,
कितना समय लगेगा यहां से मुक्तेश्वर जाने में,
प्रणय की तो जान ही निकल गयी ये सुन के,
हक़बका के बोला जल्दी में, करीब तीन धंटे,
अल्मोड़ा से जब चले तो रात के थे नौ बजे,
काली स्याह रात में चांद बैठा उसके बगल में,
थोड़ी दूर निकले ही थे कि चांद लगा सोने,
रूक नहीं रही थी नींद अंगड़ाई लेते हुए,
कहा प्रणय ने सुस्ता लो बड़ी देर से हो बैठे,
फ़ौरन गद्दी पीछे कर करवट ली बदल के,
प्रणय चलाता रहा गाड़ी उन रस्तों पे आहिस्ते,
चांद सोया हुआ था, नब्ज़ नहीं उसके बस में,
सोच रहा था अगर वो जायेगा मुक्तेश्वर ले के,
सुबह सवेरे नंदिनी को करना पड़ेगा विदा उसे,
ये सोच कर ही उसके रोंगटे हुए खड़े जाते,
मन ही मन कुछ बुन के फ़ैसला लिया उसने,
नंदिनी को वो बैठाएगा हल्द्वानी से बस में,
मोड़ जो जाता है मुक्तेश्वर उसे पीछे छोड़ के,
चल दिया वो मन मगन गाड़ी उधर मोड़ के,
रस्ते में आता है इक स्थान कैंची कहते हैं उसे,
पहुंचे हुए संत की जगह बरसों के तप से सजे,
संत बाबा नीब करौरी, कैंची धाम कहते,
कहते हैं बड़े बड़े महापुरुष थे शिष्य उनके,
प्रणय की बस एक चाह एक राह क्या कहे,
गाड़ी धीमी कर किया प्रणाम धाम को उसने,
धीमी गति से रोक गाड़ी सोचा मुंह भी धो ले,
लम्बी सी अंगड़ाई लेते हुए उतरा वो गाड़ी से
अकस्मात एक चमकदार रौशनी थी उसे दिखे,
उसने सोचा थका हुआ शायद इस कारण दिखे,
उसने सोचा नंदिनी को भी धाम के दर्शन करवा दे,
हौले से जा रहा बोलने देखा नंदिनी गायब गाड़ी से,
इकदम डर के कांप गया हलक़ मुंह को आ गया,
लगा देखने इधर उधर समझ कुछ ना आ रहा…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava