ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : दरख़्त की छाँव!!! भाग १४
नंदिनी : दरख़्त की छाँव!!! भाग १४

नंदिनी : दरख़्त की छाँव!!! भाग १४

क्या हुआ उस रात को उसे ना पता चला,
वो सरल हृदय ढूंढने में नंदिनी को लगा रहा,
ये उसका भृम था या सच या था सपना,
यही प्रार्थना करता मिल जाये नंदिनी वहां,
रौशनी के आने और नंदिनी के ग़ुम हो जाने,
इसके बीच कोई संबंध तो नहीं कौन जाने,
अभी सोच ही रहा था वो कि अचानक ही,
उसकी आंख खुली और देखा गाड़ी है खड़ी,
नंदिनी भी पास वाली गद्दी पे थी सो रही,
उसका बदन पूरा भीगा था इतनी ठंड में भी,
सबसे पहले तो ये कि उसे ये तसल्ली हुई,
सपना ही था क्योंकि नंदिनी तो गाड़ी में थी,
क्या थकावट थी मन उकलाहट थी या बेचैनी,
जो देखा उसने सच लगा पर था तो सपना ही,
हो जाते हैं भृम जब दिमाग हो ख़ासा थका,
समझ नहीं सका था, जो उसके साथ घटा,
चूंकि चला रहा था वो गाड़ी बहुत देर से,
इंद्रियों का शिथिल होना लाज़मी है ऐसे में,
यही सोच के तसल्ली हुई कि सब ठीक है,
नींद खुल गयी नंदिनी की आवाज़ सुन के,
काफ़ी थके लग रहे हो वो बोली प्रणय से,
फिर पूछा उसने कहां तलक हम पहुंच गये,
और कितना समय लगेगा मुक्तेश्वर पहुंचने में,
देख उसे ऐसे हतप्रभ प्रणय लगा था हंसने,
बोली नंदिनी ये क्या बात हुई हंसने की भला,
मज़ाक तो नहीं किया बस पूछ रही हूं रस्ता,
चुप हो गया प्रणय फिर कुछ भी ना बोला,
उसने ये राज़ कि जा रहे हल्द्वानी नहीं खोला,
चल पड़े फिर वहां से दोनों आगे को जाने,
जानी सी जगह लगी नंदिनी को वहां पे,
बोली ये है भुवाली क्या आ गये ग़लत रस्ते,
या मुक्तेश्वर जाने को इधर से है जाते,
नंदिनी सुध लेना चाहती थी घर का उसके,
लड़की गहरा सोचती है, क्या जाने लड़के,
समझ नहीं पाया वो क्या कहे किधर जा रहे,
शहर से गुज़रते हुए पुलिस ने रोका रात धरे,
पूछा उन दोनों से इतनी रात किधर जा रहे,
बोला सोच कर प्रणय जाना है हल्द्वानी हमें,
सवेरे दिल्ली की बस पकड़वानी है इन्हें,
पुलिस ने रोक खोल दी, बढ़ाई गाड़ी उसने,
नंदिनी हो रही भौंचक्का हो क्या रहा ये,
उसने प्रणय से पूछा गाड़ी कोने में रुकवा के,
जाना था मुक्तेश्वर क्यों हल्द्वानी जा रहे,
बिना बात की खीज दौड़ गयी उसके चेहरे,
क्या वो सोच रही थी क्या कर दिया प्रणय ने,
प्रणय भी इकदम सकपका गया तेवर देख के,
फिर धीरे से कहा अगर मुक्तेश्वर हम जाते,
मुश्किल होता हल्द्वानी पहुंचना सवेरे सवेरे,
कैसे कहती वो कि कोई नहीं जल्दी उसे,
फ़र्क़ नहीं पड़ता ग़र देर भी हो जाती भले,
ग़लती तो नहीं कर दी प्रणय भी लगा सोचने,
बोला हिम्मत बांध के मुक्तेश्वर ही चलो चले,
बिजली कौंध गयी नंदिनी के सारे बदन में,
और ख़ासा सुकूं मिला प्रणय को ये समझते,
जल्दी जल्दी चल पड़ा वो घर को अपने,
मुक्तेश्वर जब पहुंचे बजे थे सवेरे के पौने छः,
गाड़ी से उतरकर वो ले चला उसे घर अपने,
दस बारह क़दम पे वहां से था प्रणय का घर,
नंदिनी भी चल पड़ी पीछे पीछे घर उसके,
पौ फट चुकी थी ख़ासी सर्दी थी उस रस्ते,
एक मंज़िल थी बगल से सीढ़ी जाती छत पे,
बेहद मनोरम दृश्य था सुबह सवेरे तड़के,
दूर तक कोहरे की चादर फैली थी पहाड़ों पे,
छत पर जा चुकी थी नंदिनी पूछ के प्रणय से,
ज़रा देर में चाय के साथ प्रणय आया छत पे,
दोनों थके हुए थे बेहद फिर भी चुस्त दिखते,
उम्र ही ये ऐसी जिसमें फ़िकर हो क्यों कर के,
चाय की चुस्की लेते लेते बोली नंदिनी हौले से,
क्या तुम अकेले ही रहते हो यहां और कब से,
पूरा वृतांत तफ़सील से बता कर प्रणय ने उसे,
नंदिनी भी सोचती रही ज़िंदगी कहते है इसे,
बातों का सिलसिला चलता रहा यूँही देर से,
प्रणय ने ये महसूस किया जल्दी नहीं थी उसे,
नंदिनी ने इक बार ना कहा वो उसे छोड़ने चले,
बातचीत के बीच मे नित्य कार्य चलते रहे,
दोनों ही तैयार हो कर नाश्ता करने को बैठे,
इक महिला आती थीं खाना बनाने घर उसके,
स्वादिष्ट सा बनाया था नाश्ता उन्होंने प्यार से,
हिम श्रृंखलाएं दिखती सामने वाली खिड़की से,
इतनी प्यारी आवाज़ें थी चिड़ियों की झंकार से,
मद्धम सी हवा बहती रहती पेड़ो के बाज़ार से,
मधुर संगीत उठता चीड़ साल और देवदार से,
हलों का चलना सीढ़ीदार खेतों की कतार में,
गिलहरियों का दाना चुनना पेड़ों की डाल से,
कहीं टिटहरी व कोयल गाती गीत मल्हार के,
मन में प्यार भरा हो तो लगता जी इस संसार में,
दो दिलों में है चाहत कहना चाहते इकदूजे से,
अन्जाने डर से मगर कह नहीं पाते इकदूसरे से,
वो ये तो जानते थे कि प्यार है उन्हें दूसरे से,
इसका यकीन ना था कि हां ना हुई क्या करेंगें,
अपने प्यार पे ऐसा विश्वास आता है मुश्किल से,
इसलिए वे दोनों इधर उधर की बात करते रहे,
मन में था उनके शायद दूजा पहल पहले करे,
बैठे खिड़की पर दोनों जहां से श्रंखलाएं दिखे,
तबतक नंदिनी बोल पड़ी, है आज पूरा समय,
रात की बस पकड़ूंगी दिल्ली की हल्द्वानी से,
तसल्ली हो गयी प्रणय को आज का दिन मिले,
मन ही मन वो ख़ुश हो, गया वो तैयार होने,
नंदिनी को भी दिखा के कमरा दूसरा उसने,
बोला ग़र चाहो थोड़ा आराम कर लो कमरे में,
नंदिनी की भी थी वही अवस्था प्रणय था जिसमें,
बोली मैं तैयार हो जाती हूं दिखाओ शहर मुझे,
ताज़ा तरीन हो के वो दोनों घर से पैदल निकले,
छोटा सा क़स्बा मुक्तेश्वर इक सड़क के किनारे बसे,
हर मोड़ से हर दृश्य पर्वतों का और ख़ूबसूरत दिखे,
चॉकलेट की पुरानी दुकान नंदिनी को दिखाते हुए,
बोला ये पुरानी दुकान है अंग्रेज़ों के ज़माने से,
उम्दा व ढेरों किस्म की चॉकलेट थीं उस दुकान में,
नंदिनी ने थोड़ी ख़रीद लीं साथ ले जाने के लिए,
घने पेड़ों की छांव के बीच टहलते टहलते जा रहे,
इतनी ज़्यादा घना कि सड़क पर नमी बैठ हुई,
बस पेड़ों से निकलती हवा की आवाज़ सुनाई देती,
कोई फ़र्लांग भर का था वो रास्ता फिर रोशनी थी,
प्रणय फिसलते फिसलते बचा थाम के हाथ नंदिनी,
चलते चलते कुछ दूर पर एक बड़ा से फाटक दिखा,
पार कर वो रास्ता, प्रणय ने दिखाया दफ़्तर अपना,
कृषि अनुसंधान का वो विश्व में है केंद्र बहुत बड़ा,
बेहद सुंदर प्रांगण सजा हुआ दरख़्तों से लगता,
बहुत बड़े से क्षेत्र में वो अनुसंधान केंद्र था फैला,
बड़े दरख़्त की छांव में नंदिनी बैठी, प्रणय बैठा,
चलता रहा दोनों के बीच बातों का लंबा सिलसिला,
बातों ही बातों में आया ज़िक्र नैनीताल निवास का,
सिहरन सी दौड़ गयी जब ज़िक्र छिड़ा मुलाक़ात का…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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