ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : उलझन सुलझे ना!!! भाग १६
नंदिनी : उलझन सुलझे ना!!! भाग १६

नंदिनी : उलझन सुलझे ना!!! भाग १६

“ख़त खुला मजमून पढ़ा ज़िंदगी गुलज़ार,
नंदिनी की नींद उड़ी, क्या ये था चमत्कार,”

नंदिनी ने क़रीने से खोला ख़त कुछ ऐसे,
जैसे प्रणय निकल आएगा उसमें जादू से,
करेगी वो ढेरों बातें जो सोची नहीं उसने,
ख़त पढ़ने का माहौल बना रही ख़ुद में,
पहली दफ़ा हुआ कि ख़त महबूब लगे,
और यूँ महबूब से मिलने में संकोच लगे,
आख़िर ख़त को खोला क़रीने से उसने,
एक एक शब्द को दस बार पढ़ा उसने,
लिखा नहीं कुछ ऐसा जो इज़हार करे,
पर हर शब्द के छुपे मायने समझ आते,
सोच के जवाब लिखना शुरू किया उसने,
क्या लिखे कैसे ख़याल नहीं आये उसे,
इसी उधेड़बुन में दो चार दिन बीत गए,
फिर भी उसका जी, लिखने का ख़ूब करे,
ग़र मुहब्बत हो जाए और बयां ना हो पाए,
बड़ी मुश्किलों वाला वक़्त होता है ये,
वक़्त भी है जवां और समां भी है सुहाना,
किस तरह गुज़रेंगे ये पल, हाय तेरे बिना,
यही थी वो सोचती और यही था लिखना,
क्या वो लिख गयी ख़त में उसे नहीं पता,
मन भी ना किया उसका वापस पढ़ने का,
सांस बांध के, डाक बक्से में ख़त डाल दिया,
जब हाथ से छूटा ख़त तब उसे होश आया,
कहीं कुछ लिख तो नहीं दिया था ऐसा वैसा,
अब कर ही क्या सकती थी चुप साध लिया,
दिनों दिन ख़त के जवाब का इंतेज़ार किया,
हफ़्ते भर में प्रणय को उसका ख़त मिला,
उसे लगा उसने उम्मीद से ज़्यादा है पाया,
उसको था विश्वास उसे जवाब नहीं मिलेगा,
ख़त पा कर हुआ भौंचक्का और बांवरा,
इक ही सांस भरकर पूरा ख़त पढ़ डाला,
शुरू का ख़त पढ़ उसने सोचा क्या हुआ,
जो लिखा है उसे अंदर तक महसूस किया,
सपने सच भी हो सकते हैं, सोचने लगा,
नंदिनी दिल ओ दिमाग पे छाई है उसे पता,
जो महसूस हो दिल से ऐसा क्या था लिखा,
कुछ जज़्बातों कुछ मुलाक़ातों का ज़िक्र था,
असल में इतना ही प्रणय के लिए काफ़ी था,
कि वो नंदिनी की मीठी यादों में वाबस्ता था,

ख़त क्या लिखे क्या कहे सोच रहा था,
इसी उधेड़बुन से घंटो तक जूझ रहा था,
लिखने बैठा तो संबोधन तय नहीं कर पाया,
पहला ख़त जब लिखा था आसान पाया,
बस नंदिनी लिख कर आगे लिख डाला था,
चूंकि जवाब का मुन्तज़िर पहली दफ़ा ना था,
इसलिए ख़त लिखना नंदिनी को आसां था,
अब क्या करे, जब ख़त का जवाब आ गया,
और इस बार उसे ख़त का जवाब है लिखना,
इसीलिए क्या लिखे ये सोच, हो रहा अनमना,
ग़र संबोधित करे प्रिय या प्रिये तो क्या होगा,
सिर्फ़ नाम लिखे तो शायद मौका गवाना होगा,
सोचते सोचते रात हो चली चिंतन करता रहा,

चल रही अलग ही उलझन अदित्य की ढाका में,
जबसे पहुंचा हैं वहां, याद नंदिनी और आने लगे,
कैसी मजबूरी है कि मजबूर है भी और नहीं भी,
किससे कहे दिल की और किससे बांटे मन की,
इसी बीच इक महीने के लिए आना था वापस,
सोच के आया था कि मिल के रहेगा नंदिनी संग,
और कहेगा अपने दिल की साफ़ साफ़ सामने,
जो होगा देखा जाएगा, आगे की भगवान जाने,
जब पहुंचा तो सर्दी का मौसम था दिल्ली में,
दिल्ली ख़ूबसूरत लगती ही है घनघोर सर्दी में,
अगले ही दिन वो जा पहुंचा नंदिनी के घर में,
आश्चर्यचकित कर देगा वो जब नंदिनी दिखे,
ऐसा ही सोच कर वो आया था उससे मिलने,
इतना उत्साहित था कि दरवाज़ा खटखटा के,
इक तरफ़ छुप गया वो खम्बे के पीछे हो के,
खोला दरवाज़ा ना पाया किसी को नंदिनी ने,
सोचा शायद ग़लती से कोई खटखटा गया है,
करने चली थी बंद दरवाज़ा कि आ गया सामने,
देख आदित्य को दंग रह गयी, खड़ी उसे देखते,
भूल ही गयी कि उसको बुला ले अंदर घर के,
यकायक सचेत हुई और फिर बोली घबरा के,
बाहर क्यों खड़े हो, आ जाओ अंदर घर के,
थोड़ी अनमनी थोड़ी विचलित सी हो गयी वो,
सोच ना पायी कैसे कहे क्या कहे अदित्य से,
बैठने का इशारा कर वो गयी दूसरे कमरे में,
बैठ गयी इक जगह गहराई से सोचने लगी,
आदित्य की आंखों में वो, वो देख चुकी थी,
जिसका डर था उसे जब वो दादी से मिलने गयी,
आज वो समीकरण सच बन खड़ा वो देख रही,
झंकझोर कर ख़ुद को जल्दी ही बाहर आयी,
सादी सी मुस्कान उसने चेहरे पर ओढ़ रखी,
आदित्य के सामने वाली कुर्सी पे आ कर बैठी,
पल दो पल दोनों के बीच बैठी रही ख़ामोशी,
जैसा अभिनंदन सोचा उसके विपरीत थी स्थिति,
दोनों में इतनी जान पहचान तो फिर भी थी,
कि बातें शुरू करने में दोनों को देर ना लगी,
पर बातों में उनकी औपचारिकता बहुत थी,
आदित्य को लग रहा पहले जैसी बात ना थी,
नंदिनी उसके होने से स्वाभाविक नहीं हो रही,
स्थिति को संभालते हुए बोला देर काफ़ी हुई,
बस दुआ सलाम के लिए आया, चलूं, है जल्दी,
ये बात कह कर उसने वहां से चलने की सोची,
नंदिनी जो अभी तक थी थोड़ी उखड़ी उखड़ी,
इकदम सचेत हो कर आदित्य से आहिस्ते बोली,
माफ़ करना मैं कहीं कुछ और जगह थी खोयी,
ख़यालों में थी व्यस्त की सुधबुध नहीं कोई,
कृपया बैठो ज़रा, मैं चाय बना कर हूं लाती,
आदित्य ने मन ही मन चैन की सांस भरी,
धप्प से बैठ गया कुर्सी पर कुछ बोला नहीं,
नंदिनी ने जल्दी से चाय चूल्हे पर रखी,
और फिर प्रणय के ख़त को सोचने लगी,
जवाब नहीं आया था उसके ख़त का भी,
अचानक देखा उसने चाय उबलने को हुई,
छान कर चाय नमकीन साथ बाहर ले आयी,
फिर आदित्य के साथ लंबी बात शुरू हुई,
आदित्य बता रहा था ढाका के तबादले की,
कितना याद करता था पिछली मुलाक़ातों की,
कहना चाह कर भी कह ना पाया वो दिल की,
और ढेरों बातें कर, बारी थी वापस चलने की…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *