अभी भी बातें आंखों में चल रहीं थी,
नंदिनी कहने को हुई फिर चुप रही,
दादी के घर से चल तो पड़े थे दोनों,
पर जाएंगें प्रणय के घर ये तय नहीं,
जब पहुंचे अल्मोड़ा तो प्रणय पूछा,
कहां जाने का दिल है नंदिनी का?
चाहते हुए भी वो ये कह ना सकी,
उसका मन था मुक्तेश्वर को जाने का,
सोचते हुए बोली कि काम है दिल्ली में,
बहुत समय हो गया है बिना कुछ करे,
हल्द्वानी से बसमें मुझे बिठा दो,
ज़रूरी काम करने हैं मुझे दिल्ली में,
जबकि चाहती थी कि प्रणय उसे रोके,
और प्रणय भी चाहता था वो घर चले,
कुछ सोचते हुए वे दोनों कुछ ना बोले,
प्रणय ने हल्द्वानी से उसे बस में बैठा के,
विदा ली ये कहते हुए कि जल्द मिलेंगे,
दोनों ही विव्हल थे इकदूजे की याद में,
पर नौकरी भी करनी है बिना बात के,
मुक्तेश्वर में प्रणय और नंदिनी दिल्ली में,
अपने अपने काम में दोनों थे जुटे हुए,
वैसे तो था ही क्या दोनों के बीच में,
दिल बिना किसी वजह परेशान रहते हैं,
जहाँ में शायद इसी को प्यार कहते हैं,
हां, प्यार तो साफ़ दिखता है दोनों में,
मगर रास्ता साफ़ नहीं दिखता है उन्हें,
यही वजह होगी कि बात बढ़ी नहीं आगे,
कुछ समय कोई बात नहीं हुई उनमें,
प्रणय क़ाफ़ी व्यस्त था काम में अपने,
जाना पड़ा कई जगह दौरे पे उसे,
इस बीच दोनों ख़तों के ज़रिए जुड़े रहे,
दोनों को इकदूजे की ख़बर मिल जाती
कभी कभी प्यार में बातें आगे नहीं बढ़ती…
इक करिश्मा होते हुए दिख रहा इन दिनों,
नंदिनी के मां पिता सौहार्दपूर्ण हो चले थे,
वजह नहीं थी शायद इसकी या राम जाने,
हां नंदिनी के लिए बड़ी सुखद थी ख़बर ये,
कई सालों में ऐसे मंज़र देखने को मिले,
ना जाने कितनी ही प्रार्थनाएं की थीं उसने,
जो हुआ सो ठीक हुआ बस यही सोच के,
नंदिनी ख़ुश थी अपने माता पिता के लिए,
लौट आईं थी खुशियां घर की उसके,
भाई बहन भी सब इस अवस्था से संतुष्ट थे,
यूँही बैठे बैठे आसूं छलक उठे नंदिनी के,
वो जान ना पायी थे वो किस बात पे,
शाम ढली रात होने को हुई तो लगी सोचने,
शायद अब वो बात कर सकेगी मां से अपने,
प्रणय के बारे में करनी थी मां से बातें उसे,
पर अभी तय नहीं किया था करे कि ना करे,
नंदिनी की पी एच डी अब खत्म होने पे है,
और उसे नौकरी की अर्ज़ियां भरनी हैं…
करीब करीब छः महीने हो चले थे मिले,
प्रणय को जाना था रुद्रप्रयाग कुछ काम से,
उसको बिताने थे वहां करीब तीन महीने,
सूचित किया नंदिनी को ख़त के जरिये,
चला गया वो रुद्रप्रयाग काम को करने,
करीब महीना बीता होगा कि इक दफ़े,
काम निपटा के वापस आ रहा गौचर से,
रात हो चली और ठंड बड़ी थी रास्ते में,
उसकी जीप ख़राब हो गयी अचानक से,
क्या कर सकता है वो उस घुप अंधेरे में,
चूंकि कोई ज़रिया ना था कि क्या करे,
फ़ैसला किया कि वहीं गाड़ी में सो ले,
थोड़ा डर थोड़ी आशंका उसके मन में,
चिंता थी कि जंगली जानवर ना आए,
हिम्मत जुटा वो लगा गाड़ी बन्द करने,
इक पहाड़ी जो उधर से गुज़र रहे थे,
पूछा कि क्या कोई मदद चाहिए उसे,
पहले शंका फिर विश्वास धर्म है ये,
यही सोच कर लगा वो उनसे पूछने,
थोड़ी बातों के बाद विश्वास हुआ उसे,
बुज़ुर्ग ने कहा यहां रहने में ख़तरा है,
उनका घर वहीं पास के गांव में है,
प्रणय बहुत पशोपेश में फंस गया,
जो भी करना था तुरन्त था करना,
समझ ना आये कि क्या किया जाए,
निर्णय लिया आख़िर जाने का उसने,
बुज़ुर्ग ने कहा साथ आ जाये उनके,
जब कोई विपत्ति आती है इंसान पे,
इंद्रियां उसकी लगती है काम करने,
हौले जा रहे थे बेहद घनघोर अंधेरे में,
क़रीब दो किलोमीटर दूर थे गांव से,
अजीब ओ ग़रीब आवाज़ से डर के,
उसने पूछा साथ चल रहे बाबा से,
आपको डर नहीं लगता इन अंधेरों से,
कुछ दिन रहो तो डर निकले, बाबा बोले,
इन्हीं बातों के बीच दूर कुछ दिये से दिखे,
प्रणय को लगा कि वो गांव हैं आ लगे,
जान में जान आई जब पहुंचे पास में,
बाबा ने अपने घर के किवाड़ खटखटाये,
जल्दी से उनकी बेटी ने किवाड़ खोले,
बहुत ठंड हो रही थी और वो जम रहे थे,
अलाव जले हुए थे वो जब अंदर आये,
बाबा और प्रणय सीधे अलाव के पास बैठे,
तबतक बाबा की बेटी चाय बना लाई,
उसको पी कर दोनों ने कुछ राहत पाई,
पहाड़ी रातों में सन्नाटा जल्द हो जाता है,
रात जल्दी ही स्याही बिखेरती लगती है,
बाबा ने प्रणय से कहां सो जाओ यहीं पे,
वहां इक लचीली सी चारपाई थी उसके लिये,
प्रणय था थका और डरा हुआ सा इसलिये,
सो जाना चाहता है वो जल्दी से,
इंतेज़ार सवेरे का, गाड़ी की चिंता भी थी उसे,
कब नींद आ गयी मालूम ही नहीं पड़ा उसे,
सोते ही इक सपने के सुपुर्द हो गया वो…
मीठी थकी नींद के बीच देखा उसने,
कोई उसका दरवाज़ा खटखटा रहा है,
इक साधु उधर से जा रहा इक आ रहा है,
देखा कि वो रास्ता बैकुण्ठ को जाता है,
पर बैकुण्ठ तक कोई पहुंच नहीं पाता है,
वो भी उठा और साथ हो लिया साधु के,
जो पास में दिखता था वो दूर बहुत है,
रास्ते में पहाड़ और दरिया पार करने हैं,
फिर वो सुंदर वन शायद मिल सके,
अब तो मृग मरीचिका जैसा लगा लगने,
कहीं बैकुण्ठ है? मन ही मन लगा सोचने,
ऊहापोह में भी जा रहा था साधु के पीछे,
समझ नहीं आ रहा था कहां डोरी खींचे,
इसी बीच मृग मरीचिका में देखा उसने,
कुछ ज्योतिपुंज सा जगमगाता दिखे,
ज़ोर ज़ोर से उसके क़दम उस ओर बढ़े,
जो देखा उसने वहां पे वो बयां से था परे,
अलौकिक जगह हर तरफ़ शांति फैली रहे,
कुछ लोग दिखे मगर उनमें उद्गार ना थे,
प्रणय उस ज्योतिखंड में उत्साहित दिखे,
उसका वहां से वापस आने का मन ना करे,
इतनी अद्भुत जगह थी कि क्या ही कहें,
मंदिर की घंटियों जैसी आवाज़ सुनाई दे,
थोड़े समय में आवाज़ और गहरी होती चले,
अचानक से वो गहरी निद्रा से जाग उठे,
कोई दरवाज़े की कुंडी खटखटाता बैठे,
जल्दी से वो निकला अपनी रज़ाई से,
और आहिस्ते से उसने किवाड़ थे खोले,
चाय लायी थी बाबा की बेटी उसके लिये,
चाय का गिलास लिया बड़ी विनम्रता से,
धीमे स्वरों में वो बोली तैयार हो जाइये,
फिर कुछ साथ में बाबा के खा लीजिये,
इक तो अजनबी घर और लोग वहां थे,
उसपर रात बाबा ने उसपे अहसान किये,
ये सोच कर प्रणय और कृतार्थ होता चले,
दूर सुदूर पहाड़ों में विनम्रता अभी भी बसे,
कितने सज्जन लोग सरल जीवन जिये,
यही सब सोचते हुए तैयार हुआ जल्दी से,
उन सबका तहेदिल से शुक्रिया कर के,
ख़ासकर बाबा के पैर छू आशीर्वाद ले के,
और ये कहते हुए कि जल्द मिलेंगे,
वो लगभग भागता हुआ पहुंचा गाड़ी पे,
गाड़ी शुरू हुई जाने क्या हुआ था रात में,
शायद उसको इस तरह से करने थे तजुर्बे…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava