क़रीब दस बारह महीने निकल चुके थे,
प्रणय और नंदिनी के बीच सम्पर्क हुए,
नंदिनी भी लगी हुई थी अपने काम में,
महीना था मई का गर्मी थी ज़ोरों पे,
वैसे भी गर्मी होती है तेज़ दिल्ली में,
नंदिनी जल्दी जल्दी काम ख़त्म कर के,
जाना चाहती थी पहाड़ों में जल्दी से,
गाइड ने कहा पी एच डी जमा करे,
आजकल वो पागल हो रही इसीलिए,
कई दिनों से दिनरात काम कर के,
कहीं भाग जाना चाहती थी अकेले,
इसी बीच मौका मिला पर्चा पढ़ने,
जो उसने लिखा था कुछ महीने पहले,
पढ़ना था इलाहाबाद विश्वविद्यालय में,
उसने अपने गाइड से इजाज़त ले के,
प्रयागराज से इलाहाबाद की यात्रा करने,
उसका मन ख़ासा खिन्न था कुछ समय से,
अच्छा मौका है मुख़ातिब होने का ख़ुद से,
रेल की यात्राएं बड़ी यादगार होती हैं,
बनते बिगड़ते रिश्तों की दास्तां होती है,
अभी रेल चली ही थी कि उसके कूपे में,
इक परिवार लगा वहां खाना खाने,
नंदिनी की जगह थी बीच वाली सीट पे,
थोड़ा खिसक के बैठ गयी इसी के चलते,
उस पे मां जी बोली बेटी कुछ खा ले,
सफ़र में मिल के चले तो सफर ना लगे,
रोक ना सकी इतने प्यार से कहा उन्होंने,
नंदिनी भी साथ लायी थी पराठे अपने,
उसी परिवार के साथ उसने साझा किये,
उसी बीच बात चल रही थी माता जी से,
लड़का और लड़की मिल पूरा परिवार थे,
प्यारी सी लड़की थी छोटी कक्षा में,
लड़का कर रहा था स्नातकोत्तर दिल्ली में,
वो हैं टनकपुर के पता चला बातचीत से,
ज़िक्र हुआ प्रणय का जो बात बढ़ी आगे,
बातों में मालूम हुआ कि प्रणय की बुआ हैं,
तार झनझना उठे नंदिनी के हृदय के,
सन्नाटा छा गया कुछ देर उसके आगे,
सोच रही थी बातचीत नहीं हुई प्रणय से,
कोई कारण नहीं था बातचीत बंद होने में,
क्या सूझा कि दोनों बातचीत नहीं करते,
नंदिनी को उसकी याद सताती हर पल में,
फिर भी साल होने को हुआ बात किये हुए,
वो थोड़ी अनमनी हो गयी और गयी सोने…
सवेरे सवेरे इलाहाबाद की मीठी ख़ुश्बू से,
उतरी वो रेल से विश्वविद्यालय को जाने,
नंदिनी को लेने कुछ लोग आ गए थे,
ठहराने उसको अतिथि निवास ले गये,
आज पढ़ना है उसको पर्चा सबके सामने,
थोड़ी बेचैनी थोड़ा घबराहट हो रही उसे,
हालांकि ये हालत होना अच्छा होता है,
पर्चा पढ़ा बहुत ही अच्छे से उसने,
नंदिनी हमेशा भरी रहती है विश्वास से,
उसके पर्चा पढ़ने की तारीफ़ की सभी ने,
भूरि भूरि प्रशंसा सुन अच्छा लगा उसे,
वो सारा दिन बिताया वहीं पर नंदिनी ने,
अगले दिन रात का सफ़र करना था उसे,
पूरा दिन बिताया उसने संगम के किनारे,
लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन भी किये,
नंदिनी ने सोचा सिविल लाइंस घूमते हुए,
इलाहाबाद से बनारस दूर नहीं है जाना,
क्यों ना वो बनारस होते हुए दिल्ली जाए,
टिकिट वापस कर के बस पकड़ी उसने,
बनारस पहुंच गयी वो शाम होते होते,
गंगा आरती को देखने गयी सबसे पहले,
रूकी बनारस के “वाई डब्लूय सी ए” में,
क़ाफ़ी देर तक बैठी रही गँगा के तट पे,
देर रात वापस आयी वो सिर्फ़ सोने,
तैयार हुई तड़के सवेरे काशी विश्वनाथ जाने,
पौ फटने के पहले की आरती देखी उसने,
थोड़ी भावुक हो गयी वो बाबा के सामने,
मांगना था बहुत कुछ पर मांगा नहीं उसने,
कुछ मांगना व्यर्थ जब सब मिला है उनसे,
शिव शम्भू बम बम बोले भोलेनाथ से,
यही सोच दर्शन कर वो गयी गंगा तट पे,
नाश्ता किया वहीं कुछ घाटों को देखते हुए,
सुना बहुत ही शांति मिलती है वाराणसी में,
ऐसा ही महसूस किया उसने वहां पे,
अजीब ओ ग़रीब चमत्कारिक जगह है,
मन शांत कर वो तैयार थी वापिस जाने,
दिल्ली पहुंची वो रात की यात्रा कर के,
कमरे में पहुंची, देखा भाई आया मिलने,
बोला माता पिता ने भेजा है उसे लेने,
नंदिनी को भी याद सता रही थी उनकी,
थोड़े दिनों का काम है ख़त्म कर चल दूंगी,
भाई बोला मुझे भी करना है कुछ काम,
दो चार दिनों में साथ ही चलते हैं बेरीनाग,
नंदिनी जल्दी जल्दी निपटाने लगी काम,
मन उसका शांत था चाहिए था आराम,
सोच रही थी मन ही मन जा के मिले,
प्रणय से मिले साल से ज़्यादा हो गए हैं,
उसकी याद भी बड़ी तीव्र आती है उसे,
टीस उठती है कि नहीं सम्भाली जाती है,
लेकिन उसे पूर्ण करने के लिए ईश्वर ने,
मुहब्बत भरी है औरत में इतनी कि छलके,
उसी की मुहब्बत से ये दुनिया चलती है,
ना हो ये तो क़यामत नज़दीक दिखती है,
जबसे लौटा है प्रणय हो के रुद्रप्रयाग से,
वो भूलता नहीं वो रात किसी भी बात से,
वैसा तजुर्बा होना सौभाग्य की बात है,
उसके लिए वो अविस्मरणीय रात है,
उसके मन की उथलपुथल भी शांत है,
मुख़्तलिफ़ तजुर्बों की दी हुई सौगात है,
बाबा और उसका परिवार अब ख़ास है,
जब कभी हो सका मिलवाएगा नंदिनी से,
ऐसा सोच कर रखा है उसने तभी से,
जबकि इकदूजे को दोनों ही नहीं जानते,
जानते तो हैं पर शायद नहीं पहचानते,
मुहब्बत के इस असमंजस में मज़ा भी है,
ज़्यादा समय खिंच जाए तो सज़ा भी है,
कभी लगता है कि हैं सदा इकदूजे के,
कभी प्रतीत होता है कि नहीं जानते,
प्रणय ने इक ख़त लिखा और भेजा है,
ऐसे तो जाने कितने लिखे पर नहीं भेजे,
इस बार इंतेज़ार थोड़ा लम्बा हुआ है,
नंदिनी थी नहीं इसलिए पता नहीं है,
जब लौट के आयी देखा पोस्ट बॉक्स में,
ख़त को लेते ही जान गई है कहां से,
मन ही मन ख़ुश थी बहुत अंदर से,
नाराज़गी इतनी कि क्या ना कर डाले,
उसको जाना भी था भाई के साथ घर पे,
और ख़ुश थी कि मिल सकेगी ये सोच के,
प्रणय भी नहीं गया था घर क़ाफ़ी दिनों से,
उसके माता पिता ने कितने ही ख़त भेजे,
इसीलिए सोचा कि वो घर जाए अपने,
तय किया कि जाएगा नंदिनी के घर होते,
थोड़ी चिंता थी और दादी जानती थी उसे,
इक हफ़्ते बाद जाने की सोची थी उसने,
वैसे तो वो बस से भी जा सकता है,
पर सोचा कि घूमता जाएगा मस्ती में,
दोनों अपनो से मिलने को व्याकुल थे,
दूरी ने उनके बीच के फ़ासले बढ़ा दिए,
प्यार में दूरी बड़ी घातक हो सकती है,
याद का क्या है आती है जाती नहीं है,
याद करने से दूरियां बहुत नज़र आती है,
क्या हो सकता है कि दोनों ना मिल सकें?
चलिये साथ सफ़र में ख़ुद देख लीजिए…
क्रमशः …
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava