कोई बात होती ही होगी मुहब्बत में,
जागते हुए सोते नींद में जागते रहते,
जबसे लगी है बला मज़ा ही अलग है,
इस बेचैनी की ना दवा ना ही ये मर्ज़ है,
दोनों की क़ैफ़ियत ऐसी हो रही है,
दोनों ही नहीं जानते कि क्या चाहते हैं,
दोनों के बीच में बस इक बात साफ़ है,
मुहब्बत है इकदूजे से मानना नहीं चाहते,
कौन करे पहल पहले बात करने की,
कौन बांधे बिल्ली के गले में पहले घंटी,
कुछ वक़्त और गुज़र गया यही सोचते,
क्या बला है मुहब्बत कि जीने भी ना दे,
वो मीठा दर्द उस दर्द का अपना मज़ा है,
लंबे समय तक दर्द सहना इक सज़ा है,
मन है मिलने का भी और नहीं भी,
ये कैसा ताला जिसकी नहीं कोई चाभी,
अलहदा रहने का मर्म है कोई समझे कैसे,
मुहब्बत हो जाये, सब नहीं ख़ुशनसीब ऐसे,
चूंकि हो गई है मुहब्बत दोनों को शिद्दत की,
बाँवले से घूमते दोनों दीवानों की तरह यूँही,
जुड़ रहा परिवार नंदिनी का खुशी इस बात की,
प्रणय के साथ व्यवहार कैसा, वो सोचने लगी,
पहाड़ के लोग होते हैं बेहद सीधे साधे,
ना कोई छलावा ना ही कोई झूठे वायदे,
ज़्यादातर लोग रहते है मन मगन ख़ुद से,
सुबह तड़ के उठना सो जाना अंधेरा होते,
किसी से पूछो रस्ता नहीं बता हैं पाते,
उनकी दुनिया सीमित है उन्हीं के द्वारे,
ऐसे में जब कोई बाहर जाता है पढ़ने,
और सरलता से समझ आते रहस्य उन्हें,
फिर उसकी हिमायत करते हैं मिल के,
सीखना चाहते हैं वो बहुत उत्सुकता से,
इन सरलताओं के बीच हैं परिवार उनके,
नंदिनी और प्रणय को आते नहीं छलावे,
मुहब्बत हो गयी है उन्हें कोई कैसे भुलावे,
माता पिता की ज़िद भाई का आना लेने,
नंदिनी पहुंची गयी बेरीनाग कई बरसों में,
प्रणय भी तैयारी कर रहा था घर जाने की,
उसको उत्सुकता नंदिनी घर पहुंचने की,
लड़के शायद तबियत से होते हैं फक्कड़ी,
मुहब्बत में मुहब्बत से आरज़ू मिलने की,
मुक्तेश्वर से चला, जाने को खजूरी ख़ास ही,
पार कर रहा था अल्मोड़ा की बाज़ार यूँही,
मधुर संगीत के लिए टेप खरीदता था वहीं,
गया उस दुकान जहां से टेप थी ख़रीदनी,
शौक़ था हर तरह का संगीत सुनने में,
और चारों ओर प्रकृति के गीत बुनने में,
नये पुराने कई तरह के टेप ख़रीदे उसने,
इक टेप वो भी जिसे दोनों सुना करते थे,
प्रणय उस टेप को लगाकर बार बार सुने,
संगीत की तासीर रूह को सुकूं पहुंचता है,
गीत संग गाये जाएं तो संगीत उभरता है,
प्रणय और नंदिनी कालचक्र के खेल में हैं,
अभी उम्र के उस मुक़ाम से गुज़र रहे हैं,
जहां मन मे प्यार पनपना स्वाभाविक है,
किसी को चाहना चाहते रहना प्राकृतिक है,
पर अहम छाया रहता है उम्र के इस दौर में,
दोनों ही शिकार हैं अपने अपने अहम के,
दोनों को आता नहीं कि संभाले कैसे उसे,
यही वजह है कि अहम बैठा दरम्यां उनके,
मज़े की बात जुदाई सहन नहीं होती उनसे,
फिर भी बात करने को राज़ी नहीं इकदूजे से,
क्या होगा इन दोनों का अब राम ही जाने,
प्रणय रुका कसार देवी अल्मोड़ा निकलते,
आसमां साफ़ नन्दादेवी चोटी दिखी सामने,
पहाड़ों का झुंड खेल रहा बर्फ़ से लदे हुए,
साँप सीढ़ी जैसे रस्ते मन को मोह रहे,
जी उठा प्रणय नंदिनी की तीव्र याद से,
अहसास ही नहीं कि अहम खड़ा बीच में,
पहाड़ अक़्सर आपको विनम्रता सिखाते,
विनम्र रह के व्यक्तित्व हैं बड़े हो जाते,
लचीला होना बड़ी अच्छी बात होती है,
और ये कि हर दिन के बाद रात होती है,
अक़्सर रात दिन दिन रात के खेल में,
धड़कते दिलों में मुहब्बत पनप जाती है,
मुहब्बत में कोई क्योंकर इतना सोचे,
मुहब्बत है ये क़ाफ़ी, इसकी वजह क्यों ढूंढ़े,
अपने से ही सवाल और जवाब भी अपने,
मुहब्बत क्या ना करवाये जो चढ़ के बोले,
यही ख़याल प्रणय को छू के गुज़र रहे थे,
असमंजस में था कि इसके आगे क्या करे?
जब ख़ुद से ख़ुद का ऐतबार उठने लगे,
तो ईश्वर की याद कर उसकी शरण ले,
थोड़ी देर रुक के नज़ारों का मज़ा लेते हुए,
याद आये वो पल जो नंदिनी के साथ थे,
इन्ही रास्तों पर वो बारिश की झमाझम,
बस दोनों थे साथ और कुछ नहीं हमदम,
वो रास्तों का रुकना बारिश नहीं रही थम,
कैसे कहें कि उस पल को भूले नहीं हम,
यादों में बसी वो और ये हंसी पल ए सनम,
किस क़दर उसको याद किये जाते हैं हम,
इन्हीं ख़यालों में डूबा पहुंचा खजूरी ख़ास,
और लगभग दौड़ता सा गया दादी पास,
शाम होने को थी पर धूप में थी मिठास,
कुंडी खटखटा रहा मिलन की थी आस,
किवाड़ खुला वो जा पहुंचा दादी खाट,
पैर छू कर परिचय दिया बैठ उनके साथ,
पहचान गयी थी दादी कि कौन है ये ख़ास,
सामने वाले मोढ़े पे बैठने का किया प्रस्ताव,
प्रणय की नज़रें ढूंढ़ रहीं थी कुछ आसपास,
बड़ी ही उत्सुकता से ताक रहा हर बार,
दम ले लो बेटा, बोली दादी समझ आस,
फिर उन्होंने ही पूछा कैसे लगे हमारे द्वार?
झिझक के बोला बस जा रहा हूं अपने घर,
रस्ते में सोचा मिलता चलूं आप सबसे इधर,
दादी ने कनखी निगाहों से सब लिया भांप,
आहिस्ते से बोली रुक जाओ यहीं रात,
अंधेरा भी हो चला है रास्ता भी है दुर्गम,
ऐसे में कैसे जाने देगे तुमको हम,
जाना है जल्दी तो सवेरे तड़के चले जाना,
जा कर हाथ मुंह धो लो फिर खाओ खाना,
प्रणय रुक गया इतनी आत्मियता से कहा,
बूढ़ी अम्मा ने उसे ऊपर वाला कमरा दिया,
इकदम ही लगा उसे जैसे नंदिनी हो पास,
जब आती इसी कमरे में करती है निवास,
रज़ाई, दुशाले कमरे में बसी उसकी महक,
प्रणय को लगा कि कहीं वो जाए ना बहक,
बेरीनाग में कहानी ही अलग चल रही थी,
परिवार के पुराने दोस्त सपरिवार आये थे,
बचपन में साथ साथ खेले थे सारे बच्चे,
दो बच्चे थे इक तरुणी इक तरुण उनके,
तरुण कर रहा अच्छी नौकरी बंगलोर में,
दोनों परिवारों की मंशा थी कि रिश्ता बने,
इसीलिए नंदिनी को गया था भाई बुलाने,
नंदिनी को समझ आई जब बेरीनाग पहुंचे,
मन ही मन नंदिनी लगी थी ये सोचने,
क़ाश इस समय प्रणय होता साथ उसके,
हालांकि बेरीनाग बहुत छोटा सा शहर है,
पर वहां पे संकीर्णता से उठे हुए लोग हैं,
नंदिनी की मां ने आहिस्ते पूछा नंदिनी से,
क्या तुमको अभी रिश्ते में बंधना मंज़ूर है,
मां की बात सुन हतप्रभ रह गयी थी वो,
नहीं अपेक्षित थी ऐसी परिपक्वता उसे,
रूंधे हुए गले से बस इतना कहा मां से,
थोड़े दिनों और इंतेज़ार हैं कर सकते,
मां ने बोला प्यार से सर पे हाथ फेरते,
हम साथ हैं तुम्हारे,जैसा तुम्हें ठीक लगे,
और कहती भी क्या नंदिनी, मां से,
वो आश्वस्त ही कहां थी प्रणय को ले के,
लेकिन दिल तो लगा था उसी निर्मोही से,
उधेड़बुन की अवस्था के बीच खड़ी सोचते,
बोली, दादी घर हो आए दो चार दिन के लिए…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava