ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी: चोट लगी दिल पे!!!भाग २५
नंदिनी: चोट लगी दिल पे!!!भाग २५

नंदिनी: चोट लगी दिल पे!!!भाग २५

अब बहुत दूर आ गया प्रणय चलते चलते,
जान तो थी पर पैर उसके अब थक से रहे,
पहाड़ों में जबतक चलते रहो ठंड नहीं लगती,
थोड़ा रुको और धूप से दूर तो ठंड बढ़ जाती,
रुका इक मोड़ पे जहां से हिमश्रृंखलायें दिखती,
नीचे दूर तक फैली वादियों में हरियाली बिछी,
मन करता कि उड़ कर देखूं सब बनकर पक्षी,
कभी वादियों में कभी पर्वतों पे डेरे डालूं अभी,
इन्हीं विचारों के साथ वो बैठा रहा देर तक वहीं,
ग़ौर से देखा उन पेड़ों को जो ऊंचे होते जा रहे,
शायद अपने प्रेमी से मिलने सूरज तक जा रहे,
प्रेम प्यार आस की प्यास ग़र ना हो ज़िंदगी में,
कैसे फिर कोई मायने हो इस दुनिया में जीने के,
आलिंगन इन दृश्यों से करने का दिल करता है,
इस ईश्वर की सृष्टि में समां जाने का दिल करता है,
और साथ हो वो बग़ैर जिसके जी नहीं लगता है,
क्या प्रकृति सुंदर किसी व्यक्ति विशेष से लगती है,
क्या पत्थर पहाड़ निर्जीव हैं सिवा किसी अमुक के,
क्यों होता ऐसा कि दिल नहीं लगता बिन किसी के,
वो है तो सारी सृष्टि है सुंदर पहाड़ नदियां ये रस्ते,
यानि कि जज़्बातों की ख़ूबसूरती भी चाहिये उसे,
ये होना ही चाहिये ज़िंदगी को मायने देने के लिये,
कितने ही ऐसे और ख़यालात ज़हन में उठते रहे,
कुछ के जवाब मिले कुछ सवालात ही रह गये,
जब तंद्रा टूटी प्रणय की वो जगा इस अहसास से,
बहुत देर हो चली, दादी चिंता करती होगीं कबसे,
वो उठा और चल पड़ा जल्दी से दादी घर को जाने,
क़ाफ़ी दूर निकल आया था यूँही सोचते विचारते,
सारी अवस्थाओं के बीच भी सोच रहा उसी के बारे,
प्यार का ज़हर कब किसी के उतरता है जल्दी से,
खजूरी ख़ास दिख रहा था दूर, बस इसी वास्ते,
प्रणय ने इशारा कर रोका गाड़ी को उधर जाते,
क़ाफ़ी थक भी चुका था वो अब सैर करते करते,
गाड़ी वाले ने उतार दिया प्रणय को बाज़ार किनारे,
वहां से कोई फर्लांग भर रह गया था दादी का घर,
आहिस्ते आहिस्ते भारी मन से वो चला दादी घर…

तबतक नंदिनी आ गयी दादी के पास तैयार हो के,
और बतियाने लगी दादी संग साथ कुछ खाने पीने,
दादी ने कहा आज मन कर रहा है छत पर जाने का,
क्या तू मुझे ले चलेगी धूप खिलाने ले चेलगी वहां,
आज वाकई में छिटकी हुई धूप खिली थी वहां पे,
नंदिनी बोली दादी से चलिये चलें धूप खाने छत पे,
बेहद आहिस्ते छत पे पहुंचे इक इक सीढ़ी चढ़ के,
इक आराम कुर्सी रखी हुई थी दादी बैठीं उस पे,
नंदिनी भी खड़ी हुई थी मुंडेर का सहारा ज़रा लिये,
इसी बीच दादी ने छेड़ी बात क्या करना है आगे,
नंदिनी बोली उसकी पढ़ाई अब ख़त्म होने को है,
बस उसे अब नौकरी की ढुंढाई करनी है ज़ोरों से,
फिर जहां भी लगेगी नौकरी बस वहीं चल देगी,
इसके सिवा और उसने कुछ सोचा नहीं है अभी,
चूंकि दादी अच्छे से समझती हैं कैफ़ियतें दिल की,
नंदिनी के यह कहते कहते समझ तो गयीं थीं,
कुछ ऐसा है जो ना प्रणय ना ही नंदिनी हैं जाने,
बस मन ही मन में बुनते रहे हैं जीवन के ताने बाने,
दादी ने कहा क्या सोचती है हमसफ़र के बारे में,
इक चुप सी बैठ गयी थी उस समय उसके होठों पे,
थोड़ा रुआंसा सा हो आया उसका मन क्या कहे,
कभी कभी दिल की कही, कही नहीं जाती क्या करें,
फिर स्थिर हो कर बोली ना हमसफ़र है ना चाहिये,
ज़िंदगी गुज़ारने के लिये ये सब ज़रूरी नहीं है,
ज़रूरी है कि आपके पास नौकरी होनी चाहिये,
जिससे कि ज़िंदगी आराम से काटी जा सके,
काटी? दादी हैरान रह गयीं उसकी बातें सुन के,
काटी का क्या मतलब ज़िंदगी है जीने के लिये,
और अगर तुझे नहीं दिखते हैं मायने इसमें,
तो फिर दिल की सुनो दिमाग़ की जगह अपने,
हतप्रभ सी हो गयी थी नंदिनी ये सब सुन के,
पर दिमाग़ में इतनी चीज़ें चल रहीं थीं क्या करे,
ज़िंदगी जीते कैसे हैं यह पूछा दादी से उसने,
क्या आपको नहीं लगता ज़िंदगी जी रही हूं मैं,
बड़े प्यार व भोलेपन से नंदिनी के गाल चूमते,
तुझे क्या लगता है ज़िंदगी यूँही गुज़ारी है मैंने,
समझती हूं मैं तेरा हाल जो है बेहाल ए पगली,
मुहब्बत में कब किसे ठीक से नींद है आती,
तुझे इक साथी चाहिये जो साथ रहे उम्र भर,
और जितना मैं जानती हूं जो प्यार करे उम्र भर,
नंदिनी कुछ ना बोली बस टिकी रही मुँड़ेर पर,
वो जानती थी कि दादी सच कह रहीं हैं मगर,
क्या कभी महसूस होगा प्यार उसे, ये था डर,
निकलना चाहती थी अगर मगर के चक्कर से,
इंतेज़ार हर मुहब्बत का इम्तेहां लेता है ठीक से,

पहाड़ों का मौसम नख़रे दिखाते प्रेमी सा होता है,
कभी खुला खुला सा कभी काला घना होता है,
अच्छी ख़ासी धूप फिर अचानक ही बादल आ गये,
छत से उतरे सब जल्दी से बादल दहाड़ मारने लगे,
दादी के कमरे में जा बैठे सभी जो छत पर थे,
कमरे में आते ही दादी बोली उन्हें कुछ काम है,
और बूढ़ी अम्मा को साथ ले वो गयी पड़ोस में,
छाता भी ले लिया, जिससे बचे रहे बारिश से,
पहाड़ी छोटे कस्बों में इकदूजे को सब जानते हैं,
पड़ोस के घर कुछ काम था बुलवा भेजा इसीलिये,
खिड़की समीप बैठी नंदिनी रिमझिम बारिश में,
जाने क्या ताके जा रही थी इकटक देखते हुए,
प्रणय भागा चला आ रहा था बारिश से बचने,
सर पर रुमाल रखा हुआ था हाथ ऊपर आंखों के,
बारिश इतनी थी कि दिख नहीं रहा था थोड़ी दूर पे,
जिस खिड़की पर बैठी नंदिनी वो खुलती सड़क पे,
पर बारिश के धुंधलके में कुछ नहीं दिखता उसे,
बारिश थोड़ी तेज़ हुई तो प्रणय भी भागा ज़ोर से,
उसी भागने में उसका पैर लड़ गया इक पत्थर से,
और गिरा वो धड़ाम से चारों खाने चित्त हो के,
खिड़की के पास गिरा वो आवाज़ आयी ज़ोर से,
दर्द से कराहने की गूंज उसकी सुन ली नंदिनी ने,
नंदिनी भौंचक्की रह गयी प्रणय की आवाज़ सुन के,
फिर भी उसे विश्वास ना हुआ सोचा कान हैं बजते,
खिड़की से सटी हुई देख रही थी वो सड़क पे,
तबतक लोगों का झुंड इकट्ठा हो गया पास उसके,
जड़वत खड़ी ही थी कि फिर सुनी आवाज़ उसने,
और उसे यक़ीन हो चला कि ये प्रणय ही है,
नंदिनी लगभग दौड़ ही पड़ी कमरे से निकल के,
दादी का घर थोड़ी ऊंचाई पर था सड़क से,
क़रीब दस सीढ़ियां थी चबूतरे से उतरते हुये,
सीढ़ियां पे फिसलन थी बारिश की वजह से,
नंदिनी बेहाल हो दौड़ रही थी उन सीढ़ियों पे,
फिसल गया पैर नंदिनी का उन सीढ़ियों पे,
और लगभग रगड़ते हुए वो जा गिरी वहीं पे,
जहां प्रणय क़ोशिश कर रहा चोटिल होते हुए,
पैर की एड़ी में ख़ासी चोट लग थी नंदिनी के,
पर देखते ही प्रणय को खो बैठी सारे होश अपने,
झमाझम बारिश में किसी ने ना देखे नीर बहते,
प्रणय को भी होश ना रहा नंदिनी को देख के,
फौरन वो उठ खड़ा हुआ नंदिनी को संभाल के,
कंधे पे उसके टिकी हुई थी नंदिनी दर्द एड़ी में,
दोनों ना देखे कि दोनों की आंखों से नीर झर रहे,
किसी तरह इकदूजे का हाथ थामे वो सीढ़ी चढ़े,
और चबूतरे के बाद बरामदे में दोनों जा बैठे,
ख़ुशी हो या ग़म हमेशा ये आंसू ही होते है,
जो बिन बोले सारी बातें ख़ुद ब ख़ुद हैं कह देते…
क़ाफ़ी चोट लगने के बाद वो दोनों थे मिले,
इसलिये दोनों इकदूजे की तीमारदारी में लगे,
दादी तो सब जानबूझ कर गयी थीं पड़ोस में,
वो भी बड़ी देर से इंतेज़ार में थीं कि घटे ये लम्हें…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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