ना बरसे फाल्गुन फुहार,
बिखरे ना हीं रंग बौछार,
ना गाये होरी मेघ मल्हार,
बिनती करे हैं कन्हैया से,
तुम्हरी राधा तुम्हरा इंतजार,
औ मन ही मन बैठी हैं ठान…
अबके होली ना खेलूं पिया,
काहे को सताये हो रसिया,
बालगोपालन संग मुरलिया,
आ जाओ मोरे मोर पंख धार,
तो बरसे फिर फाल्गुन फुहार,
संग तुम्हरे ही खेलूं होली त्यौहार,
हर घर राधा की यही दरकार,
अपने कान्हा संग रंग बौछार,
हर घर कान्हा की यही गुहार,
अपनी राधे संग अबीर गुलाल,
चाहत से भरा ये सारा माहौल,
सराबोर हो खेलो रंगों का त्यौहार…
बुरा ना मानो ये है होली रंग,
सब मिल खेलों इस रंग मंच,
किसी के रूठने में है लज्ज़त,
किसी से मनवाने की है चाहत,
रूठने मनाने से आती है रंगत,
होली में खुलकर बयाँ हो मुहब्बत…
यही तो है रंगों का अम्बार,
इसी में घोल दो सारे ग़ुबार,
फिर तन मन को धो कर,
गूंधो कान्हा राधे सा प्यार,
होली मुबारक़ सबको बार बार…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava