ज़िंदगी की सरजमीं पर...
गोमती के पानी का असर!!!
गोमती के पानी का असर!!!

गोमती के पानी का असर!!!

बात बात पर,
कभी कभी हर बात पर,
आंख भर आती है,
ये परेशानी का सबब है?
या मेरी नादानी गज़ब है…

सारी सारी रात,
कभी कभी दिन के बाद ,
बहुत याद आती है,
इनमें ‘मैं’ बस इक अदद है,
ना हो सकती कोई मदद है…

सभी के साथ साथ,
अकेले, बैठे आस पास,
वो तन्हाई में आती है,
लहलहाती तब मेरी तबियत है,
उस लमहें मुझे मेरी ज़रूरत है…

बेहद लगता है अच्छा,
उसपे कुछ रचते रहना,
लफ़्ज़ों में नहीं उतर पाती है,
शायद शब्द मेरे ही कमतर हैं,
या वो बस मौन की धरोहर है…

हृदय में उठती है भावना,
किसी दिशा में बहाव ना,
मन के कोने में ठहर जाती है,
कानों में फुसफुसाती अक्सर है,
और मेरे अश्कों में वो निरंतर है…

अवध का है इक दायरा,
मनु के जी को जो भा रहा,
इश्क़ में घटायें घिर के आती है,
हां, ये गोमती के पानी का असर है,
यहां के माहौल में नफ़रत बे असर है…

ना शिक़ायत ना गिला,
जिसको जो भी मिला,
ये उसकी नवाज़िश है,
यहां के नुक़्ताचीं में भी सबब है,
और इसी को कहते मुहब्बत है…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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