ज़िंदगी की सरजमीं पर...
मुहब्बत!!!

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ३

इन्ही ख़यालों के बीच पहुंची घर अपने,और सारी रात निकली बुनते हुए सपने,हक़ीक़त से परे थे वो सपने जिन्हें मैंने,अन्जाने चुन लिया था अपनी ज़िंदगी …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग २

जबसे उसको अपना माना मैंने,इंतेज़ार बड़ी सज़ा है, ये जाना मैंने,इंतेहा तो तब हुई, नाम ना जाना मैंने,कैसा अनुभव, जिसे जीना जाना मैंने,और ये भी …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १

दरख़्त के पास वाली दुकान से,कुछ ख़रीद रहा था जब पहुंची मैं,देखा भी ना था मैंने उसे ग़ौर से,और क्यों ही देखूं किसी को मैं?जब …

इक शाख़!!!

इक शाम शरद की,ठंड भी थी पड़ रही,इक शाख़ दरख़्त की,खिड़की से झांक रही,लचीली लोच से भरी,इशारों में कह रही,मुहब्बत हूँ मैं,ज़रा खोल खिड़की… जो …