दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १६
सिलसिला बस यूंही चलता रहे मांगा ईश्वर से मैंने,बाहर पहुंच के ये बात शायद समझ में आई उनके,क्या कहें कि थामे हुए हैं हाथ मेरा …
सिलसिला बस यूंही चलता रहे मांगा ईश्वर से मैंने,बाहर पहुंच के ये बात शायद समझ में आई उनके,क्या कहें कि थामे हुए हैं हाथ मेरा …
यूं जाने का मन तो था नहीं, पर था भी वहां से,कभी कभी कुछ अनुभूतियों को स्वीकारने में,ख़ुद के साथ वक़्त चाहिये उसे जज़्ब करने …
अगले दिन पहुंच गई मैं जल्दी, उनके आने से,पर मैं ये भूल गई थी कि जाना है पहले पढ़ने,उनसे तो मिलेगें अब हम सारा दिन …
बात हद से गुज़र जाये, तो बात नहीं रहती,रात, भरे पूरे दिन में कभी रात नहीं रहती,बादल आ के ढांप ले उजला उजाला अगर,और बरस …
उन्हें गये, काफ़ी दिन गुज़र चुके थे,हालत में बेचैनी थी उनके इंतेज़ार में,इंकार कि इक़रार नहीं सोच रही मैं,बस एक ख़ुमारी चढ़ी हुई थी मुझपे,परेशानी …
कहते हैं कोशिशें कामयाब होती हैं,कोई क़सर ना रखी क़ोशिश करने में,निकले ही थे पढ़ के उनकी कक्षा से,आवाज़ आयी, अरे अंबरीन ज़रा सुनो,क्या कहा? …
फिर यूँ हुआ इक दिन विश्विद्यालय में,पहला पहला दिन था उसके प्रांगड़ में,मैं जा रही थी एम ए की कक्षा में बैठने,समय हो चला, तेज़ी …
मन ही मन बड़े जतन ये गुन रही थी मैंक़ाश मिल जाये, जिसकी बांवली थी मैं,पर हुआ ना ऐसा गवां बैठी थी मौका मैं,अपने ही …
क्या चाहिये आपको, क्या माजरा है,बोली मैं आहिस्ते से दुकानदार से,कुछ नहीं बस आती हूं किसी को ढूंढ़ने,दुकानदार ने पूछा आख़िर ढूंढ़ना किसे,ग़र हुलिया बताओ …
देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,इसलिये बेधड़क हुई …