ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : मीठी अनुभूति!!! भाग ६
नंदिनी : मीठी अनुभूति!!! भाग ६

नंदिनी : मीठी अनुभूति!!! भाग ६

नंदिनी स्वाभिमानी लगती अभिमानी,
उसकी इस ख़ूबी से प्रभावित थे सभी,
बस ज़िंदगी में थी तो प्यार की कमी,
अपनी इस भावना को नकारती रही,
या उसे डर था घर का जहां युद्ध लड़ाई,
तू तू मैं मैं आपस में बात शुरू होते ही,
इस अनुभूति से कहीं अंदर वो थी डरती,
उसको लगता उसकी बाईं आंख फड़कती,
सोचती थी पहरों पहर सयानी नंदिनी,
बचपन के प्यार की मीठी सी अनुभूति,
क्या उसे मौका देना चाहिये ख़ुद को भी,
क्या पता उसे उससे ज़्यादा प्यार करे कोई,
इन्हीं संवेदनाओं से वो लगातार लड़ती,
हां उसकी पढ़ाई मगर धुआंधार चलती,
अपनी इन भावनाओं की कोई भी गति,
पढ़ाई और ख़ुद के बीचआड़े नहीं आने देती,
पर आख़िर थी तो मानवीय भावनाएं ही,
कब तलक वो इनसे ख़ुद को बचा पाती,
वो रिक्शे की मुलाकात चंद घड़ियों की,
मीठी मीठी याद उसे दिलाती प्रणय की,
बेहद असमंजस और ऊहापोह की थी घड़ी,
किसी भी तरह के निष्कर्ष पे नहीं पहुंची,

समय गुज़रता रहा मुलाक़ातें भी कम हुईं,
लगा ऐसा की कहानी दोनों की ख़त्म हुई,
दिल की होती है राह और चाह भी अनोखी,
क्या कभी मिल पायेंगें प्रणय और नंदिनी?

कितनी जटिल व विषम स्थिति है ये भी,
पसंद इकदूजे को फिर भी बात नहीं बढ़ती,
हां दोनों की पढ़ाई ठीक से चलती रही,
उसपर दोनों ने आंच ना आने दी कभी,
प्रणय अपने दोस्तों के गुट में शामिल,
शाम होते ही सामने के ढाबे पे सब मिल,
ज़िंदगी यूँही बसर होती गयी झिलमिल,
गंभीर मुद्दों पे चर्चा, निकलता नहीं कोई हल,
क्यूँ हो किसी को चिंता क्यूँ हो कोई फ़िकर,
बस महफिलें दोस्तों की सजती रहें दिलबर,
नंदिनी की भी यही कैफ़ियत और हाल यही,
सारे दोस्तों ने मिलकर बनायी एक टोली,
नंदिनी उस टोली की अग्रिणी सरदार हो ली,
नैनीताल के आसपास के जंगलों में होली,
क्या मस्ती भरे दिन क्या उड़ान उमंगों भरी,
उन पलों में किसको फ़िकर किस बात की,
कल की कल सोचेंगें ज़िंदगी आज है रंगोली,
सब में है रोमांच भरा सबकी अपनी अठखेली,
पहला साल कब गुज़रा पता ही नहीं चला,
दिल ओ दिमाग़ पर बोझ ना डालो इतना,
ऐसा लगा पल भर को पल रूक गया,
अभी तो साल यहीं था अभी कहां गया,
समय की है ये सबसे बड़ी क़रामत,
इक भी पल को रोकना है असंभव,
घड़ी की सुई की तरह ज़िंदगी भी टिक टिक,
अगर ना जी पाये पल फिर ना मिलेगी फ़ुर्सत,
बस पलों को जीना हमारे बस में है ये सिफ़त,

थी इच्छा नंदिनी की वो पढ़े आगे भी,
उसका मन करता अनुसंधान करने का भी,
इसी उधेड़बुन में थी वो कि क्या करे आगे,
उसकी एक सहेली ने सलाह दी आ के,
तुम पढ़ाई में हो अच्छी तो करो पी एच डी,
उसके लिये क़ोशिश करो जाओ दिल्ली ही,
दिल्ली विश्वविद्यालय में ले कर दाख़िला,
सोचा मिल गया अब जीवन का रास्ता,
कुछ समय था उसके पास नैनीताल में,
अब निश्चिंत वो घूमने लगी बाज़ार में,
जब ज़िंदगी का मुक़ाम तय हो जाये,
मन के भीतर कितनी तसल्ली लाये,
इक दिन शाम वो टहल रही थी मॉल पे,
कॉफी पीने रुकी इक दुकान पे,
गुज़र रहा था प्रणय वहां किसी काम से,
आंखें टकराईं धक से हुई सांसें थाम के,
पर जानी पहचानी औपचारिकता से,
मिले दोनों और ख़ामोश पल बैठ गये उनपे,
कुछ समय तक शब्दों से कोई बात ना हुई,
सिर्फ़ आंखें ही बोलती, ज़ुबां ख़ामोश रही,
फिर बड़े ही अनमने ढंग से बोला प्रणय अरे,
नंदिनी को देख बोल पड़ा अकस्मात ही मिले,
कहा उसने जा रहा है वो इक ज़रूरी काम से,
वन विभाग मसूरी में शायद मिले मौका उसे…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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