ज़िंदगी की सरजमीं पर...
तुम!!!

हर इक शक्ति-रूपेण के नाम!!!

तेरे जैसा नहीं कोई, रखना यक़ीं चाहिये,जो तू कहना चाहे खुल के कहना चाहिये, वजूद तेरा इसलिए नहीं के रहे बंध के,ग़र हो मंज़ूर, बंधन …

इक शाख़!!!

इक शाम शरद की,ठंड भी थी पड़ रही,इक शाख़ दरख़्त की,खिड़की से झांक रही,लचीली लोच से भरी,इशारों में कह रही,मुहब्बत हूँ मैं,ज़रा खोल खिड़की… जो …