कल दोपहर बाद,
शाम ने,
महफ़िल थी सजायी,
दिन अच्छा ख़ासा दूर था,
सुबह ज़रा क़रीब थी और,
रात इठलाते हुए थी आई…
कल शाम जब,
महफ़िल में,
रात होने को शामिल हुई,
तबतक शाम धुंधला गयी,
इस्तेक़बाल किया रात का,
और फिर वो ओझल हुई…
रात अब शाम को,
ढूंढ़ने लगी,
वो रात को कहीं ना मिली,
आख़िर शाम तो ढलने चली,
रात, इस भरी महफ़िल में,
अब अकेले ही रह गई…
ख़ासी देर तलक,
रात अकेले ही,
महफ़िल सजाती रही,
यूं लगा कोई बात नहीं,
जम के जश्न मनाया,
फिर रात थक के चूर हुई…
पौ रही थी फट,
महफ़िल की कहानी,
बस इतनी थी बस,
सुबह सुबह देखा जो,
सुबह पे लाली थी छाई,
देखो तो भोर होने को आई…
अब की बार,
भोर ने,
ये बात थी बताई, के,
हम महफ़िलें हैं सजाते,
पर हम साथ नहीं आ पाते,
इक ही हो सकता है हममें,
महफ़िल में मौजूद कोई,
शाम, रात, सुबह, दोपहर,
एक साथ भले ही ना सही,
ज़िंदगी उनकी है वक़्त की सुई…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava