धुआँ धुआँ सा है ख़यालों के दरमियाँ,
साफ़ साफ़ देखने का तरीक़ा है क्या?
ग़र्द उड़ उड़ के जम रही है ख़यालों पे,
हटाने का उसको, मिलता नहीं नज़रिया,
जज़्बों की गहराई में दिखता धुंधलापन,
ख़यालों को कैसे बुने के दिखे आईने सा,
उम्र के इस दौर में समझ ही नहीं आता,
मंज़िल हैं कहां और रास्ता है कौन सा,
कभी कभी आता है ये ख़याल ज़हन में,
जो दिख रहा है, वो वाक़ई में वही है ना?
ज़िंदगी की पैमाईश करते हैं हर रोज़,
और ये के फ़रमाइशों से जी नहीं भरता,
उस जज़्बे को जीने का अलग है मज़ा,
ख़ुशी हो हद्द से ज़्यादा, तो दर्द उभरता,
तमाम क़ोशिशों के बाद भी पता ना चला,
उसी आईने में रोज़ अक़्स दिखे अलग सा,
ज़िंदगी बैठ गयी थोड़ी देर सुस्ताने को
जो उठी तो लगे, सबकुछ तिलिस्म सा,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Bahot khoob…. Khayalon ki baat..