ज़िंदगी की सरजमीं पर...
ठीक आछे!!!
ठीक आछे!!!

ठीक आछे!!!

ठीक आछे,
सब ठीक आछे,
चलो कथा बांचे,
सब ठीक आछे,

ज़रा ज़रा हांके,
आईने में झांके,
अपने को आंके,
सब ठीक आछे,

अंदर तक झांके,
क्या हुआ है बांके,
चल रहे हैं फांके,
सब ठीक आछे,

पच्चीसी सुनाके,
बत्तीसी दिखाके,
हंस के हंसा के,
रो के रुला के,
सब ठीक आछे,

मुफ़लिसी झांके,
दिखते हैं फांके,
फिर फड़फड़ा के,
कहता चिल्ला के,
सब ठीक आछे,

मांगते हाथ आगे,
बाबू देता जा रे,
बोला मुस्कुरा के,
कचौड़ी खिला रे,
सब ठीक आछे,

मगन मन ताके,
सपने सजा के,
जूता चमकाते,
कितने हुए पैसे,
बाबू पचास दे रे,
मौसम सुहाना रे,
मच्छी खाएंगें,
हम घर जाएंगें,
सब ठीक आछे,

गाड़ी रुकी मोड़ पे,
बूढ़ी मां बैठी फट्टे पे,
ज़ोर से बोलीं हमसे,
खाना नहीं खिलाएंगे,
कुछ अच्छे कर्म किए,
वो मुस्कुरा दिए,
अश्क़ इतरा दिए,
सब ठीक आछे…

ऐसे दे निवाले,
पेट भर खा लें,
कोई भूखा ना रहे,
चैन से सब सोएं,
ख़ुशी में चाहे रोएं,
ए मालिक इतना दे,
बाक़ी सब ठीक आछे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

21 Comments

  1. Shalini Varma

    तुम्हारी कविता मे हू ब हू तुम्हारी छवि दिखती है…सरल, संवेदनशील और खुश कर देने वाली।

  2. Shalini Varma

    तुम्हारी कविता मे हू ब हू तुम्हारी छवि है….संवेदनशील, सरल और खुश करदेने वाली।

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