ठीक आछे,
सब ठीक आछे,
चलो कथा बांचे,
सब ठीक आछे,
ज़रा ज़रा हांके,
आईने में झांके,
अपने को आंके,
सब ठीक आछे,
अंदर तक झांके,
क्या हुआ है बांके,
चल रहे हैं फांके,
सब ठीक आछे,
पच्चीसी सुनाके,
बत्तीसी दिखाके,
हंस के हंसा के,
रो के रुला के,
सब ठीक आछे,
मुफ़लिसी झांके,
दिखते हैं फांके,
फिर फड़फड़ा के,
कहता चिल्ला के,
सब ठीक आछे,
मांगते हाथ आगे,
बाबू देता जा रे,
बोला मुस्कुरा के,
कचौड़ी खिला रे,
सब ठीक आछे,
मगन मन ताके,
सपने सजा के,
जूता चमकाते,
कितने हुए पैसे,
बाबू पचास दे रे,
मौसम सुहाना रे,
मच्छी खाएंगें,
हम घर जाएंगें,
सब ठीक आछे,
गाड़ी रुकी मोड़ पे,
बूढ़ी मां बैठी फट्टे पे,
ज़ोर से बोलीं हमसे,
खाना नहीं खिलाएंगे,
कुछ अच्छे कर्म किए,
वो मुस्कुरा दिए,
अश्क़ इतरा दिए,
सब ठीक आछे…
ऐसे दे निवाले,
पेट भर खा लें,
कोई भूखा ना रहे,
चैन से सब सोएं,
ख़ुशी में चाहे रोएं,
ए मालिक इतना दे,
बाक़ी सब ठीक आछे…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Wah!!! Kyal beat hai…. Kolkatta yaad aa gaya!!
Bahoot badiya
वाकई में…
बहुत संवेदनशील कविता है। अच्छी लिखी है।
आभार आपका, दादा
Khub bhalo achey
Sab theek achey
Sir, बहुत शुक्रिया आपका…
Very Nice. Manish. Many Sharad.
Thanks Dada
बहुत सुंदत
सुंदर*
बहुत बहुत शुक्रिया आपका
Darun hoe che thik na khoob bhalo aache
मित्रवर, बहुत भालो आछे…तुम्हारे sketches का जवाब नहीं…
तुम्हारी कविता मे हू ब हू तुम्हारी छवि दिखती है…सरल, संवेदनशील और खुश कर देने वाली।
क्या बात है दीदी…ढेरों शुक्रिया
अति सुंदर
धन्यवाद मित्र
तुम्हारी कविता मे हू ब हू तुम्हारी छवि है….संवेदनशील, सरल और खुश करदेने वाली।
Are wah sunder
Sab Theek Aache !!
Awesome!
ख़ूब भालो आछे