ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दीवार पे चींटी!!!
दीवार पे चींटी!!!

दीवार पे चींटी!!!

दीवार पे चींटी देख कहते हैं,
हमारे घर है हाथी आया!

दाना ले जाती चींटी से बोले,
हाथी जैसा क्योंकर खाया!

लगी सोचने कुछ कहा नहीं,
वो अपनी मत में था बौराया!

चींटी ने पतिंगे से जा पूछा,
जलने में बड़ा मज़ा आया?

जो करते है वो जानते हैं,
के खप कर ही है सब पाया!

हाथी मस्त चला जा रहा था,
उसे चींटी ने मकर से बचाया!

तू ईश, हाथी ने कहा चींटी से,
चींटी कुनबे का दिल भर आया!

चींटी ख़ुश, बोली दोस्ती करोगे,
मीठी बातें सुन हाथी इतराया!

भँवरा गुंजन करता रहा दमभर,
फूल ने है किस क़दर रिझाया!

बया बैठी डाल, देखे नीचे,
घोंसला महफ़ूज़ था बनाया!

इक मुद्दे पर नज़रिये मुख़्तलिफ़,
छोटा बढ़ा, बड़ा बड़ा ना हो पाया!

जो भी रहा हो माथे की दीवार पर,
चींटी, किसी को हाथी नज़र आया!

ज़िंदगियों को पढ़ पढ़ कर भी,
वैशाख नंदन कुछ समझ ना पाया!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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