जो था, वो बस वो नहीं था,
शायद बहरुपिया रहा होगा,
कई शक़्लों में दिखता था,
हो जाता था हर इक जैसा,
उसको उसकी तरह देखना,
नामुमकिन सा लगता था,
कभी प्यार बन कर मिलता,
कभी ग़ुबार बन कर उड़ता,
इतने रूप बदले थे उसने,
असल वो भी नहीं जानता,
इकदिन वो कहीं चला गया,
सबकी आदत बन चुका था,
रपट लिखवाने गये जो थाने,
वो कौन है, कौन जानता था,
जाना हुआ अंजान खो गया,
रपट में यही लिखवाया गया,
हैं चुपचाप कोई नहीं बोलता,
बिन उसके जिया नहीं डोलता,
वो बहरुपिया रूप बदल गया,
मिलने से पहले ही खो गया,
मन का स्वरूप है बस ऐसा,
हम सबमें है इक बहरुपिया,
हम खोजते नहीं अंदर अपने,
अपने बहरुपिये से डर लगता,
होगा, कभी तो होगा ऐसा,
वो रूप बदलना ना चाहेगा,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava