नदिया किनारे इक गांव,
है प्यासा और नहीं छांव,
मिट्टी पर, निशां नहीं पांव,
नदी सूखी कैसे चले नाव,
प्यास है आस, नहीं बरसात,
आशा है, विश्वास से निराश,
प्यास तन की प्यासे मन की,
अब जी भर प्यास ही है पास,
रुंध गया गला होंठ हैं सूखे,
अश्क़ों ने सींची दुखती प्यास,
सूखे पत्ते चीख़ते चिल्लाते,
चरमराती भयभीत आवाज़,
पपड़ी बनता धरती का सीना,
मशक़ को है पानी की आस,
आस है प्यासी बरसात की,
औंधे पड़े देख रहे आसमान,
हुआ मेहरबां इकदिन आसमां,
नीर बरसा कर दुआ ली सुन,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava