ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बरोठा…
बरोठा…

बरोठा…

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

बरोठा
घर का हो,
मन का हो
या भरोसे का,
गुज़रना ही पड़ता है,

किवाड़
घर का,
या अंतर्मन का,
राम का रहीम का,
खोलना ही पड़ता है,

मोह,
घर से,
किसी दर से,
अंतः करण से,
अंततः छुड़ाना ही पड़ता है,

चोट,
अपनों की,
गहरे बैठे मन की,
विश्वास तोड़ने की,
मरहम लगाना ही पड़ता है,

सीढ़ी,
साँप सीढ़ी सी,
या हो पीढ़ी की,
घर की ड्योढ़ी की
पार करनी ही पड़ती है,

दर,
घर से निकलने का,
अपने अंदर का,
छलकते समन्दर का,
लाँघना ही पड़ता है,

चिटखनी,
चुने हुए नज़रियों की,
औंधी पड़ी भावनाओं की,
दिल की तिजोरी की,
आख़िर खोलनी ही पड़ती है

आँगन,
अंदुरुनी उन्माद का,
अस्तित्व के फैलाव का,
इच्छाओं के चुनाव का,
ढूँढ़ना ही पड़ता है…

“मनु शरद”

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