Copyright © by Manish Kumar Srivastava
जब नाम लिखवाया गया,
हमारा विद्यालय में,
हम दो रहें हैं साथ सदा ही,
अपने आलय में,
पहला दिन हमारा रोते गुज़रा,
कक्षा की कुर्सी पे,
आँखें दिखा खड़े दुई भैय्या,
दम निकला वहीं पे,
फिर आदत हो गयी हमको,
विद्यालय जाने की,
ननकऊ के रिक्शे पर लदे,
अमरस खाने की,
पिता संग जाते थे लेने जूते,
बाटा की दुकान पर,
विद्यालय की वेशभूषा लेने,
बिन्नी की दुकान पर,
पास ही घर के मिल जाता सब,
ज़रूरत का सामान,
कभी कभी दोनों भाइयों में,
होता था घमासान,
अम्मा का प्यार था शानदार,
जल्दी ही पिट जाते थे,
पिटने में बड़ा मज़ा यूँ आता,
खाने को लड्डू मिलते थे,
पिता ने कभी नहीं पूछा हमसे,
जब परीक्षा दे आते घर,
और हर दफ़े वो कहते हमसे,
अगले पर्चे की तैयारी कर,
हाँ हम जब जाते थे लेने,
पढ़ाई का सामान,
चौंसठ पन्ने वाली कॉपी लाते,
कहते, देना भाई जान…
“मनु शरद”
Sundar chitra kheecha hai.
Zara aur badhao. Maza aa raha he bachpan k
Khatti mithi sun ne me.
Zara aur badhao. Mazaa aa raha hai bachpan k khatti mithi sunne me