ज़िंदगी की सरजमीं पर...
जश्न ए चराग़!!!
जश्न ए चराग़!!!

जश्न ए चराग़!!!

जश्न ए चरागां है आज हर दरवाज़े,
अनुज संग सीता राम घर हैं पहुंचे,

बीते चौदह साल जाने कैसे थे गुज़रे,
पर हर पल ज़िंदगी के नायाब पल रहे,

साथ था अटूट विश्वास, आशीर्वाद थे,
परख बढ़ती गयी हर स्थिति भांप के,

सबक़ है ये सीताराम की ज़िंदगी से,
कठिन समय के साथ समझ और बढ़े,

चराग़ जलें या दीपोत्सव कहें उसे,
मन रौशन कर सब दीपावली मनाएं,

हर वक़्त मन की रौशनी रहे जगी,
ये पल ये साल तो यूंही गुज़रते जाएं,

फ़ानी दुनिया में हर शह वक़्त की है,
इक क़तरा मिला है, चलो जश्न मनाएं,

उसने दिए हैं तोहफ़े दुनिया देखने के,
स्याह दुनिया में चराग़ रौशन कर जाएं,

जहां चराग़ ना कभी जले, वहां जलाएं
इक क़तरा जी लें इक क़तरा बांट आएं,

दो पल की ज़िंदगी क्या ना कर जाएं,
मासूम दिलों के साथ मिल कर मुस्कुराएं,

इकदूजे का होने से क्यों मन को रोकें,
इक दीप तो जलाएं हम सब अंतर्मन के,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

4 Comments

  1. रोहित

    अति सुंदर ।। व्याख्यान है यह हमारी परंपरा का, विश्वास का और अटूट प्रेम का।

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