ज़िंदगी की सरजमीं पर...
ग्यारह!!
ग्यारह!!

ग्यारह!!

महीने निकले ग्यारह हैं,
ये साल बीतने वाला है,

इक और इक ग्यारह है,
अब वक़्त बदलने वाला है,

बीतते तो बस पल ही हैं,
दिन साल आज कल ही है,

इस साल क्या पाया है,
सहज सरलता से भाया है,

आज का दिन अपना है,
कल अभी इक सपना है,

कल को कल पाना है,
आज का साथ निभाना है,

दिन इक रसमलाई है,
रात ने ली अंगड़ाई है,

साल ख़त्म होने को है,
नई शुरुआत बोने को है,

नई कोपलें फूट रही है,
कुहू कोयल बोल रही है,

शुरुआत करने की फेरी है,
और अब काहे की देरी है,

नई कलियां खिलने को है,
नई दुनिया मिलने को है…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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